बदल गया है शहर का हर एक मंज़र आजकल,
चेहरों में मुस्कुराहटें हैं, दिल मगर वीरान हैं।
जो कल तलक था प्यार का रौशन-सा एक मंज़र,
नफ़रत की आँधियों ने वही ख़्वाब तोड़ डाला।
हर एक मंज़र देखकर ये सोचता हूँ देर तक,
इंसाँ बदल रहा है या बदला हुआ ज़माना है।
गुज़र गया जो वक़्त, वही सबसे हसीं मंज़र था,
अब याद की निगाह में बस उसका ही बसेरा है।
उम्मीद की नज़र से ज़रा देखिए जहाँ को,
वीरानियों के बाद भी खिलता हुआ मंज़र है।
जलते हुए मकानों का मंज़र न पूछिए,
रोता हुआ था शहर, धुआँ बोलता रहा।
"ज्ञानेश" सच की राह में मुश्किल बहुत मिली,
लेकिन ज़मीर जीत गया—क्या ख़ूब मंज़र था।
-ज्ञानेश्वर आनन्द
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