हो गर जिसकिसी शख़्स की फ़ितरत ही मुस्कुराने की,
आदत बदल सकती नहीं हज़ार मुश्क़िलात ज़माने की!
खुशमिज़ाज और जिन्दादिल लोगों केलिए कहीं कभी,
मुस्कुराने के लिए ज़रूरत नहीं पड़ती किसी बहाने की!
-एन.आर. कस्वाँ
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