मशाल की तरह
रास्ता दिखाती हैं
कुछ किताबें ।
हालांकि, अक्सर
किताबें होती हैं,
आले में रखे
दिये की तरह ।
उनमें लिखी बातें
टिमटिमाती हैं,
लौ की तरह
उम्र भर ।
कम रोशनी में
शांत चित्त से
सोचता है आदमी,
सरक आता है
नज़दीक।
जलते दिये की ऊष्मा
अंतर में जगाती है
अलख ।
मन में जाती है पैठ,
मिट्टी में जल की तरह ।
रात के चौकीदार की तरह
लाठी खटकाती है,
फेरी लगाती है लगातार ..
अंधेरा चीर कर आती है
आवाज़..जागते रहो !
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