एक ख़्वाब था इन आंखों में
बिल्कुल दिन की रोशनी सा,
रवि की किरणों का काजल
वो श्रृंगार तेज़ का और ग़ज़ल
जिसमें खिलखिलाती सी मैं और मेरी दुनिया
अब जो देख रही हकीकत इन आंखों से
ये घना अंधेरा और सनसनाहट सा
बढ़ रहे जो मेरे गले की तरफ़
ये लंबे नाख़ून ,काले डर का
इनकी खरोचों से चीख रही मैं और मेरी दुनिया ।
-प्रियंका रॉय
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