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क्या वो शख़्स तुम्हारा हो गया?

                
                                                         
                            क्या वो शख़्स तुम्हारा हो गया?
                                                                 
                            

एक ही शख़्स पर
सब कुछ लुटाने वाले,
वो शख़्स तुम्हारा हो गया क्या?
जिसके लिए दुनिया भुला दी तुमने,
उसने तुम्हें अपना बना लिया क्या?

जिसकी खुशी में अपनी खुशी ढूँढ़ी,
जिसके ग़म को अपना ग़म समझा,
जिसकी एक मुस्कान की ख़ातिर
हर दर्द को हँसकर सहा,
उसने तुम्हारी ख़ामोशी को
कभी पढ़कर देखा क्या?

जिसके लिए अपने ख़्वाब छोड़े,
अपनी ख़्वाहिशें कुर्बान कीं,
अपनी हर साँस पर जिसका नाम लिखा,
क्या उसने भी तुम्हारे नाम
अपनी ज़िंदगी की शाम की?

एक ही शख़्स को अपनी दुनिया मानकर,
तुमने हर रिश्ता पीछे छोड़ दिया,
क्या उसने भी तुम्हारे लिए
अपने अहंकार को तोड़ दिया?

एक ही शख़्स पर सब कुछ लुटाने वाले,
ज़रा ख़ुद से ये सवाल करना—
जिसे तुमने अपनी पूरी दुनिया माना,
क्या उसने भी तुम्हें अपना माना?

या फिर तुम ही प्रेम निभाते रहे,
और वो इसे तुम्हारी आदत समझता रहा,
तुम उसे अपनी किस्मत मान बैठे,
और वो तुम्हें बस एक विकल्प समझता रहा।
— रजनी
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एक घंटा पहले

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