चूसा जाता रक्त जहाँ पर नीति-न्याय के छद्म तले,
और व्यवस्था के गड्ढों में जन-मानस का भाग्य जले!अस्पताल के श्वेत महल ये खड़े मौन कफ़न ओढ़े,
जहाँ सांस की सौदाबाज़ी ज़िन्दा इंसानों को तोड़े!
काँच कँपे जिनके पाँवों से, वे निर्मित प्राचीर हुए,
पुल चमके विज्ञापन-पट पर, राही सब तीर हुए!
अट्टाहास करता शोषक है, शोषित आँखों में रात कटी,
मौन वीर जो देख रहा सब, उसकी मति है आज घटी!सीसा घोल लिया कानों में, ज़ुबाँ जकड़ दी कतरन से,
बाँध लिया है कायरता को चातुर्य के इस बंधन से!दीमकों के इस मरुथल में वह शीश आज महफ़ूज़ खड़ा,
जिसके भीतर बोध मरा है, जो प्रश्नों से विमुख पड़ा!किन्तु सुनो, ओ मौन उपासक! महाकाल का चक्र घूमेगा,
जब कोई अंगारा भड़केगा, वह अम्बर को चूमेगा!
सबसे भीषण घड़ी नहीं वह, जब विप्लव की हुंकार उठे,
सबसे निर्मित मृत्यु वही है, जब जन-जन चुपचाप रहे!जब कश्ती यह मान चुकी हो, पतवारों का मोल नहीं,
और मनुज यह स्वीकार करे कि क्रांति का कोई तोल नहीं ।
तब समझो कि राष्ट्र-चेतना का वह अंतिम अंतकाल है,
मौन जहाँ पर महापाप है, और मौन ही महाकाल है!
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