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रूहानी राब्ता

                
                                                         
                            मैं यूँ ही हर किसी से दिल की बातें नहीं करता हूं
                                                                 
                            
न जाने क्यों उसी के प्यार में हर बार गिरता हूँ।

वो बात और है कि अब नज़र उनसे नहीं मिलती,
मैं चाँद को ही देखकर उनका दीदार करता हूँ।

जो एक गुलाब का पौधा लगा रखा है आँगन में,
उसमें पानी देकर उसकी खैरियत की गुहार करता हूँ।

मिलेगी मंज़िल-ए-इश्क़ या मुकद्दर आज़माएगा,
मैं नतीजे की फिक्र छोड़, बस उनसे प्यार करता हूँ।

चले आएँगे वो एक दिन मेरी इन वीरान राहों में,
इसी इक आस में खुद को बे-करार करता हूँ।
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एक घंटा पहले

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