कैसे करूँ दिल्लगी तुझसे,
महबूब भरोसे की आस रखता है।
मेरा तुमसे दिल लगाना तेरे लिए फ़न सही,
मगर ये दिल तुझे अपनी ज़रूरत समझता है।
यूँ तो इश्क़ एकतरफ़ा भी मुकम्मल हो सकता है,
मगर ये यार वफ़ा की आस रखता है।
एकतरफ़ा दिल भी कैसे लगाऊँ
महबूब तो ख़ुद को पूरा होने की चाह रखता है।
बेवफ़ा भी कैसे कह दूँ तुझे,
जब तूने वफ़ा का वादा ही कभी किया नहीं।
मालूम है मुझे अंजाम इस इश्क़ का,
फिर भी दिल लगाता हूँ… और हर बार टूट जाता हूँ।
तू इतनी ख़ूबसूरत है कि लगता है,
जैसे मेरे लिए ही बनी है।
मै हर लम्हें उम्मीदों की झोली
लिए मुहब्बत से तेरी तरफ देखता,
और वहीं प्यार तेरी आँखों में,
देखने की आस रखता।।
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