गांव का बगीचा वो सरसों का खेत पीला
पेड़ों के टहनियों पे लगा वो झूला
सावन की हरियाली आसमां खुला
हम तो हो गए बड़े पर बचपन कहां
भुला
वो मुर्गे की बान गांव में छोटी सी दुकान
जहां मिलता था खिलौना चूरन की पुड़िया
हाथ में डंडा लिए चलती वो बुढ़िया
उसको चिढ़ाना फिर भाग जाना
फ़िर न वापस लौटे गा गुजरा जवाना
पेड़ों पे चिड़ियों का चह चहाना
कच्ची सड़क पे साइकल चलाना
स्कूल ना जाने का रोज नया बहाना
कभी सर दर्द कभी गंदे हैं कपड़े
कभी आज छुट्टी है घर में बताना
फ़िर न वापस लौटे गा गुजरा जवाना
वो गर्मी की छुट्टी मामा के घर जाना
दोस्तों में बाते बढ़ चढ़ के बताना
वो नाना का डांट वो नानी का प्यार
सब काम करने को थे हम तैयार
वो रात की रोटी सुबह गुड़ से खाना
फ़िर न वापस लौटे गा गुजरा जवाना
अब बड़े हो गए हैं
है पैसा है गाड़ी इस से अच्छी थी
सूखे टहनियों की सवारी
कुछ ही पल में पूरी जिंदगी जी लेते थे
पत्तों के पैसे से पूरी दुकान खरीद लेते थे
थोड़ी सी चीज़ों में भी मिल बांट के खाना
फ़िर न वापस लौटे गा गुजरा जवाना
-रोहित कबीर
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