हैं मन हमारा कितना चंचल ,
राहें नई नई खोजता हर पल।
एक हाथ से पकड़े आँचल माँ का ,
दूसरे पल दौड़ लगाये बेपरवाह ।
इस सफ़र में बार बार मन चाहे,
सारथी कोई मिल जाए मुरली सा ।
मार्गदर्शक बन पग पग राह दिखाए ,
बाँध प्रेम डोर से संग अपने ले आए ।
हवा के झोंके मे हैं जीवन सबका ,
जिसमे सुख दुख का हैं रेला चलता ।
मन को शांत करके कुछ देर ठहर,
महसूस कर इस अदभुत माया को ।
मत उलझाओ ख़ुदको बेकार सवालों में
तय हैं सबकुछ अपना पराया ।
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