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अपनी ही तौहीन करती हो।

                
                                                         
                            खुद के ही हाथों खुद पर, कैसा यह सितम करती हो?
                                                                 
                            
आईने में हर रोज़ अपनी ही तौहीन करती हो।
माना कि लोग मुसाफिर हैं, गुज़र जाएँगे साए की तरह,
तुम क्यूँ उजड़े हुए रास्तों पर, वफ़ा की जुस्तजू करती हो?
जिसकी आवाज़ से महकती है, तुम्हारी रूह की चाय,
उसी का हाथ थामने से, तुम जाने क्यूँ एहतियात करती हो।
खुद से दूर मत जाओ, तुम खुद ही अपनी मंज़िल हो,
क्यूँ गैर की खातिर, अपना ही वजूद ज़ेर-ओ-ज़बर करती हो?
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एक घंटा पहले

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