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एक बार फ़िर

                
                                                         
                            जब लगाव से कोई लगाव न रहा,
                                                                 
                            
तब एक मासूम मुझसे लगाव बढ़ाने लग गया।

मैंने सोचा था अब दिल किसी का घर न बनेगा,
पर वो चुपके से मेरी धड़कनों में ठिकाना बनाने लग गया।

मैंने रिश्तों की किताब बंद कर दी थी कब की,
वो हर अधूरे पन्ने को फिर से सजाने लग गया।

जिसे चाहा था, उसने तो खामोशी दे दी,
ये अजनबी बिना कहे ही मुझे अपनाने लग गया।

मैंने खुद को पत्थर समझ लिया था बरसों से,
वो अपनी सादगी से मुझे फिर इंसान बनाने लग गया।
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एक घंटा पहले

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