देह का गृहयुद्ध
अस्थि-मज्जा के तिमिर-सदन में,
मौन थाइमस के कंदरा-भवन में,
नव-कोशिकाएं सीख रहीं पाठ—क्या है '
स्व', क्या है 'पर' का ठाठ।
कठोर परीक्षा की है वेला,
निज भित्ति पर आघात करे जो अकेला,
उसे आत्म-हनन फिर करना होगा,
निज हाथों ही मरना होगा।
पर कुछ छलि रक्षक बच निकलते हैं,
त्रुटिपूर्ण, शांत, वे विचरते हैं,
रक्त-प्रवाह में सोए ऐसे—
बिन सुलगी माचिस की तीली जैसे।
फिर नियति एक चिंगारी लाती,
शिशिर की जड़ता हृदय कंपाती,
कोई भारी शोक, या कंठ में धुआँ,
जागृत तब अंध-कोशिका का तंत्र हुआ।
उसे दिखता शत्रु-विषाणु कहीं,
पर विषाणु की छवि संधि-स्थल में रही;
वह थाइरॉइड-सा ही भास रहा,
भ्रम का गहरा इतिहास रहा।
ज्वर शांत हुआ, पर अस्त्र न थमे,
वे सादृश्य अस्थि पर टूट पड़े;
अग्न्याशय शांत जो बैठा था,
उसे स्वाहा करने को रोष बढ़ा।
यह दर्पण का विस्मयकारी छल है,
प्रतिबिंबों का व्याकुल दल है;
निज घर को ढहाती देह खड़ी,
ईंट-ईंट चुनकर, विपदा में पड़ी,
यह सोच कि सम्मुख शत्रु नया,
निज रक्षक ही भक्षक बन गया।
- शफ़क़ रऊफ
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