चुप्पी का अंजाम हर-दम बुरा नहीं होता,
जुनून-ए-शौक में ये फैसला बुरा नहीं होता।
ज़ुबाँ चुप रहे तो आँखें बोल जाया करती हैं,
कभी चुप्पी के सिवा कोई रास्ता नहीं होता।
मुक़द्दर साथ न दे तो पुर-ख़तर है ख़ामोशी,
हर बार तो बंदे पे ख़ुदा मेहरबाँ नहीं होता।
कौन जाने कब कहाँ ग़र्क-ए-दरिया हो जाए,
ख़ामोशी की कश्ती का नाख़ुदा नहीं होता।
मेरा यही ख़्याल है गो मैं चुप रहा नहीं कभी,
ख़ामोशी साथ हो तो कोई दूसरा नहीं होता।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
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