जबसे तुम संग प्रीत लगाई,
मन-वृंदावन मुरली गाई।
मिथ्या जग के सकल प्रलोभन,
लगते अब केवल परछाईं॥
अधर तुम्हारे वंशी साजे,
अनहद नाद हृदय में बाजे।
छवि विलोकी जबसे मनमोहक,
मद-मर्यादा दूर विराजे॥
नयनों में छवि कान्हा आए,
पलक-कपाट न तुझे भुलाए।
विरह-तपन में तपकर देखा,
स्नेह तुम्हारा अमृत पाए॥
तट-कालिंदी रास रचाया,
गोप-वृंद संग नेह बढ़ाया।
नवनीत-चोर कहाए जग में,
तूने सबका चित्त चुराया॥
चरण-कमल में अर्पण जीवन,
भक्ति-सुमन का वंदन-अर्चन।
सत्य 'मुकुंद' हुआ यह नाता,
निर्मल हुआ प्रेम का दर्पण॥
- सनातन मुकुंद
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