शब्द नहीं—ये मौन तपस्या, प्राणों का अभिनंदन,
भावों के दर्पण में झिलमिल, चिर-अनहद का स्पंदन।
अक्षर-अक्षर दीप जले जब, तिमिर स्वयं झुक आया,
पीड़ा ने मुस्काकर अपने, अश्रु-कुसुम बरसाया।
स्वप्न नहीं—यह चेतन-सरिता, बहती अंतरधारा,
जिसमें डूबा, उसी हृदय ने पा लिया निज किनारा।
यहाँ व्यथा भी वंदन बनकर, मंगल-गीत सुनाती,
शुष्क शिला की नीरवता में, निर्झर-वीणा गाती।
एक वर्ष क्या—काल स्वयं भी, साधना में ढलता,
क्षण-क्षण अक्षर-ज्योति बन, युग-मानस में जलता।
भावों का यह दर्पण केवल, बाह्य रूप निहारे?
यह तो अंतर-ब्रह्मदीप का, शाश्वत सत्य उभारे।
युग-युग तक यह सृजन-ज्योति, चेतन-नभ आलोकित,
मानवता के मौन हृदय में, रहे चिरंतन स्पंदित।
- सनातन मुकुंद
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