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श्री और अलक्ष्मी: गीतनाट्य

                
                                                         
                            जहाँ शील और विनय का, होता पावन वास,
                                                                 
                            
वहीं विराजें लक्ष्मी, लेकर दिव्य प्रकाश।
मधुर वचन जहाँ बहें, जैसे निर्मल धार,
सुख-समृद्धि का वहीं, खुलता है हर द्वार।

त्याग-तपस्या धर्म जहाँ, संयम का हो संग,
लक्ष्मी का है रूप वही, शुभ्र शांति का रंग।
आलस तजकर जो सदा, करते सत्-आचार,
लक्ष्मी रमती हैं वहाँ, तजकर सब अंधकार।

किंतु जहाँ छल-द्वेष है, कटु वाणी का शूल,
अलक्ष्मी का वास वहाँ, जीवन होता भस्म।
कलह-कलेश जहाँ पले, तजकर गरिमा-मान,
धैर्य और संतोष का, होता जहाँ ढलान।

अंधकार के रूप में, आती वह कुचाल,
बने-बनाए भाग्य की, करती अधोगति चाल।
अपव्ययी जो जीव है, तजता निज संस्कार,
कु-छाया के जाल में, गिरता वह हर बार।

सद्गुण ही माँ लक्ष्मी, दुर्गुण ही संताप,
स्वयं चुनता जीव यहाँ, अपना पुण्य और पाप।
अंतर्मन हो शुद्ध जो, वही स्वर्ग का धाम,
आचरण की शुद्धता, लक्ष्मी का ही नाम।

दुर्गुण तज जो गहे अब, सुंदर शुभ आचार,
वही रच रहा प्रेम से, नूतन सुखी संसार।
लक्षण ही सौभाग्य हैं, लक्षण ही आधार,
लक्ष्मी आती वहीं जहाँ, होता सद्-व्यवहार।
- सनातन मुकुंद
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एक घंटा पहले

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