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वरदान : आध्यात्मिक गीतिका

                
                                                         
                            करुणा-किरण बरसे अंतर, जागे चिर-चैतन्य-गान।
                                                                 
                            
मौन-मुकुर में झिलमिल उतरे, प्रभु-कृपा का वरदान॥

अहं-तमस जब स्वयं पिघलकर, बने समर्पण-ध्यान।
शून्य-शिखर पर खिल उठता है, अमृत-ज्योति-विधान॥

अंतर-वीणा स्वयं बजाती, अनहद का मधुगान।
बिंदु-बिंदु में सिंधु प्रकटे, मिटे सकल अज्ञान॥

जिसने निज को अर्पित कर दी, प्रभु-पद पर पहचान।
उसके जीवन का प्रत्येक क्षण, बन जाता वरदान॥
- सनातन मुकुंद
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34 मिनट पहले

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