द्वार खड़ा हूँ अब कर जोड़े,
मोह-पाश सब मैंने तोड़े।
हे करुणाकर! शरण में ले लो,
जग ने मुख अब हमसे मोड़े।। १ ।।
अघ-आतप से जीवन तपता,
मन मेरा बस तुमको जपता।
करुणा की अब वृष्टि करो प्रभु,
दोष न मेरा तुमसे छिपता।। २ ।।
नयनों में है अविरल धारा,
तुम बिन कोई नहीं सहारा।
भव-सागर के कठिन भँवर में,
दिखला दो अब प्रभु! किनारा।। ३ ।।
अहंकार का हो अब मर्दन,
शुद्ध करो प्रभु! मेरा अंतर्मन।
चरण-कमल की धूलि मिले तो,
सफल हो जाए यह जीवन।। ४ ।।
सत्य 'मुकुंद' विसर्जन कीजे,
मौन समर्पण केवल लीजे।
यही याचना अंतिम मेरी,
प्रेम-भक्ति का सुधा-रस दीजे।। ५ ।।
- सनातन मुकुंद
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