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खामोशी में बैठा एक जवाब

                
                                                         
                            ना शोर, ना चमत्कार की पुकार,
                                                                 
                            
बस एक चुप सा दरबार-जहाँ सवाल खुद थक जाते हैं,
और जवाब धीरे से मिल जाते हैं।

साईं बाबा…
तुम मंदिर नहीं, एक एहसास हो,
भीड़ में भी जो साथ रहे,
वो सच्चा विश्वास हो।

जब जेब खाली, मन भारी,
और उम्मीदें लगें उधारी,
तब तेरी एक नज़र ही काफी-
जैसे सूखे में बरसात जारी।

तू देता नहीं-समझाता है,
हर दर्द का मतलब बताता है,
जो खोया है, वो भी ज़रूरी था,
ये राज़ तू ही सिखाता है।

तेरे दर पे मांगने जाऊँ,
तो शब्द खुद ही खो जाते हैं,
क्योंकि तू जानता है पहले से,
हम किस दर्द में सो जाते हैं।

न सोना, न चांदी, न हार चाहिए,
बस इतना सा उपकार चाहिए-
जहाँ भी रहूँ, जैसे भी रहूँ,
तेरा सब ठीक है वाला प्यार चाहिए।
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एक घंटा पहले

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