जीत के भी हम हार गए,
जब परहित में खुद को वार गए।
पर ये हार नहीं परिभाषा है,
ये तो मानवता की भाषा है।
जो खुद जलकर दीपक बनता,
वो जग को उजियारा करता।
अपने हिस्से का सुख जो छोड़,
दूसरों के आँसू हर लेता।
वो हार नहीं ,है त्याग महान ,
ये सबसे सच्चा सम्मान ।
जिसने खुद को बांट दिया है,
वो ही है असली धनवान ।
थोड़ा रुक कर सोच लो ज़रा,
क्या सच में तुम हार गए?
या फिर मानवता के पथ पर,
अच्छाइयों के भी पार गए।
जो गिरकर भी उठ जाते हैं,
वो असली वीर कहलाते हैं।
जो दूसरों के लिए जीते है,
वो सच्चे मानव कहलाते हैं।
चलो सभी फिर कदम बढ़ाएं,
हिम्मत को आवाज़ लगाएं।
अपने अंदर छिपे हुए उस
दीपक को फिर आज़ जलाएं।
जीत वही, जो बाँटी जाए,
खुशियाँ जो सबमें घुल जाएं।
परहित में जो जीवन खिल जाए,
सचमुच वही विजय कहलाए।
-सूबा लाल"अंजाना"
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