आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

प्रिये!

                
                                                         
                            तारों की छावं मे
                                                                 
                            
बैठी हूं , प्रिये!
छत की टेरिस पर
चांद को निहारती हुई,
तुम्हारे इन्तजार मे।
इन्तजार ,जो इस
जन्म से नही है ,
और
नही पता ,ये
और कितने जन्मों का है,
मगर हां
मेरी निगाहें पल भर मे दौड़ जाती है
उस घने अन्धेरे मे भी ,
'जहां रोशनी उस चांद और
उसके आसपास के जुगनुओं की है'
इस आस मे
कि कहीं
नजर आ ही जाओ तुम ।
और
ये हवा
जो सिहरन से भर देती है मुझे,
तुम्हारी याद दिलाती है।
प्रिये!
मै तन्हाई मे तुम्हारी ,
हर वो राह तकती रहती हूं,
जहां से आने का तुम्हारा वादा था,
बड़ी खामोशी के साथ ,
इस डर से ,कि
कहीं अगर शोर हुआ
हमारे मिलन की घड़ी के नजदीक आने का,
तो फिर से कही
नजऱ लगने से हमारा विच्छोह
ना हो जाए।
विरह मे हूं मैं,
इन्तजार करती हुई,
तुम्हारी
प्रिये!
बस....................।
तुम्हारे नाम
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर