तारों की छावं मे
बैठी हूं , प्रिये!
छत की टेरिस पर
चांद को निहारती हुई,
तुम्हारे इन्तजार मे।
इन्तजार ,जो इस
जन्म से नही है ,
और
नही पता ,ये
और कितने जन्मों का है,
मगर हां
मेरी निगाहें पल भर मे दौड़ जाती है
उस घने अन्धेरे मे भी ,
'जहां रोशनी उस चांद और
उसके आसपास के जुगनुओं की है'
इस आस मे
कि कहीं
नजर आ ही जाओ तुम ।
और
ये हवा
जो सिहरन से भर देती है मुझे,
तुम्हारी याद दिलाती है।
प्रिये!
मै तन्हाई मे तुम्हारी ,
हर वो राह तकती रहती हूं,
जहां से आने का तुम्हारा वादा था,
बड़ी खामोशी के साथ ,
इस डर से ,कि
कहीं अगर शोर हुआ
हमारे मिलन की घड़ी के नजदीक आने का,
तो फिर से कही
नजऱ लगने से हमारा विच्छोह
ना हो जाए।
विरह मे हूं मैं,
इन्तजार करती हुई,
तुम्हारी
प्रिये!
बस....................।
तुम्हारे नाम
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