राजकुमार तेरा, एक शब्दभेदी बाण।
जो ले आया था,साम्राज्य में विनाश।
सोच लेता तू, अपरिपक्व राजकुमार।
एक श्राप जीवन, कर देता है तबाह।
निशाना साधा तूने, वन्य जीव जान।
अपनों का हृदय, बिंध गया विषबाण।
बरसों दिल को, सालेगा ये अफसोस।
नही होगा कभी, श्राप मुक्त इतिहास।
तू घर जलाता ले, नफरत की मशाल।
जला दिए दूर देश, अपनों के परिवार।
नौनिहाल जो बसे, हुए कहीं दूर देश।
हिंदुत्व का शोर है, उन्हें बचाए कौन।
न ड्रोन न मिसाइल, नही मारक अस्त्र।
देश से चला जो, तीर हजारों मील दूर।
कहाँ चला ये तीर, अनकही दास्तान।
दूर देश मारा गया, इक श्रवण कुमार।
हर निरीह आत्मा से, उठती है पुकार।
जब जब अन्याय की, होती है शिकार।
नादानी शरण नहीं,नही क्षमा का द्वार।
हर अपराध का,सृष्टि में है दंड अपार।
हे राजन! नादानी की, सज़ा है अमिट।
सदियों तक रियाया, ढोती है यह पीड़।
किसने देखा है, उस परिवार का दरद।
अपने ही मारे गए, विधर्मी पर छुटे तीर।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X