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धधकते समय में मानव संवेदना की खोज

                
                                                         
                            धधकते समय में मानव संवेदना की खोज
                                                                 
                            

धरती आज भी
उतनी ही हरी हो सकती थी
जितनी किसी नवजात शिशु की मुस्कान होती है,
परन्तु मनुष्य ने
उसकी छाती पर
बारूद के बीज बो दिए हैं।
आकाश
जो पक्षियों की उड़ान के लिए बना था
अब धातु के पंखों से काँप रहा है।
बादल वर्षा नहीं
कभी कभी आग बरसाने लगे हैं।
यह समय
मानव इतिहास का एक कठोर अध्याय है
जहाँ सभ्यता का मुखौटा पहने हुए
अहंकार
युद्ध के नगाड़े बजा रहा है।

विश्व के शासक
कभी कभी ऐसे प्रतीत होते हैं
मानो पृथ्वी
किसी शतरंज की बिसात हो
और राष्ट्र
केवल मोहरे।
कहीं सीमा रेखाएँ
रक्त से खींची जा रही हैं
कहीं भूभाग की लालसा
मानवता की देह पर
घाव बनकर उभर रही है।
किसी को वर्चस्व चाहिए
किसी को प्रभुत्व का शिखर
किसी को इतिहास में
अपना नाम
लोहे की लिपि में लिखवाना है।

पर इतिहास की हर तलवार
अंततः जंग खाती है
और हर विजय
एक दिन
मानवता के आँसुओं में
अपना प्रतिबिंब देखती है।
युद्ध के मैदानों में
सिर्फ सैनिक नहीं गिरते
वहाँ गिरते हैं
माताओं के सपने
बच्चों की हँसी
और भविष्य की कोमल संभावनाएँ।

किसी घर की दीवार पर
अब भी टँगी है
उस बेटे की तस्वीर
जो कभी लौटकर नहीं आएगा।
किसी माँ की आँखों में
अब भी जलता है
एक प्रश्न
क्या पृथ्वी इतनी छोटी हो गई है
कि मनुष्य को जीने के लिए
दूसरे का घर छीनना पड़े।

मानवीय संवेदनाएँ
कभी कभी इस युग में
मानो किसी संग्रहालय की वस्तु लगती हैं
जिसे लोग देखते तो हैं
पर छूते नहीं।
सत्ता के शिखरों पर
जब अहंकार बैठ जाता है
तब करुणा
नीचे कहीं
धूल में छूट जाती है।

परंतु इस अंधकार में भी
कुछ दीपक हैं
जो अब भी बुझने से इंकार करते हैं।
उन दीपकों में
एक ज्योति भारत की भी है।
भारत
जिसने हजारों वर्षों से
यह कहा है
कि पृथ्वी
केवल भूमि नहीं
एक परिवार है।
यह वही भूमि है
जहाँ किसी ऋषि ने
नभ की ओर देखकर कहा था
सभी प्राणी
एक ही चेतना के अंश हैं।
इसलिए भारत की वाणी
तलवार की खनखनाहट नहीं
संवाद की शांति खोजती है।

वह जानता है
कि युद्ध
क्षणिक विजय दे सकता है
पर स्थायी शांति नहीं।
वह यह भी जानता है
कि मनुष्य का असली वर्चस्व
धरती पर अधिकार जमाने में नहीं
बल्कि हृदयों को जोड़ने में है।
आज जब संसार
घृणा की आँधी में डगमगा रहा है
तब भारत
शांत स्वर में कहता है
कि शक्ति का सर्वोच्च रूप
विनाश नहीं
संयम है।

यदि मनुष्य
अपने भीतर की करुणा को
फिर से जगा सके
तो यह पृथ्वी
अब भी स्वर्ग बन सकती है।
क्योंकि अंततः
इतिहास में अमर वही होते हैं
जो युद्ध नहीं
मानवता को बचाते हैं।
-सुशील शर्मा
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