आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ज्यादा क्या कहूँ 'उपदेश' बस इतना समझो।

                
                                                         
                            तुम्हारे जाने का गम छोड़ेगा नही मुझको।
                                                                 
                            
तसल्ली देने का सबब सिखाने आते मुझको।।

गुज़रे वक्त की देहरी में कैद हो गई जब से।
भटकती रूह सहारे नजर आते नही मुझको।।

अब देखती हूँ आईने में ये आँखें गैर लगती।
बेताबी में जीने के बहाने आते नही मुझको।।

आँखों की मेढ रूठे आसुओं को न रोकती।
अपनेआप बहते सम्हालने आते नही मुझको।।

रंगों से नाराजगी रूढ़िवादी प्रथा ज़माने की।
खामोश लबों पर वो तराने आते नही मुझको।।

ज्यादा क्या कहूँ 'उपदेश' बस इतना समझो।
ख्वाब में भी अब तुम छूने आते नही मुझको।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर