दिखता हूँ मैं शांत बड़ा, पर मन में एक उबाल है,
दुनिया देखे रूप मेरा, पर भीतर का कुछ और हाल है।
सोच रहा हूँ क्या करना है, किस पथ पर बढ़ जाना है,
मंजिल की इस आपाधापी में, अपना वजूद बनाना है।
थक कर बैठूँ, यह मुमकिन नहीं, अभी तो चलना बाकी है,
सूरज की तपिश सहकर भी, उजियारा करना बाकी है।
बाधाएँ तो आती हैं, हर पग पर शोर मचाती हैं,
पर दृढ़ निश्चय के आगे, वे खुद ही घुटने टेक जाती हैं।
मौन खड़ा हूँ आज भले, पर यह चुप्पी एक ढाल है,
उठने वाला है जल्द ही, मेरे भीतर का भूचाल है।
स्वयं को गढ़ना है मुझको, खुद का ही संबल बनना है,
काँटों वाली इन राहों पर, अब निर्भय होकर चलना है।
अभी न सोचा हार के बारे, अभी तो पंख फैलाना है,
आसमान की इन ऊंचाइयों को, मुट्ठी में कर लाना है।
लोग कहेंगे पागल मुझको, लोग कहेंगे ये नादान,
पर मेरी जिद ही लिखेगी अब, मेरी अपनी एक पहचान।
वक्त की लहरें टकराएंगी, मुझको रोज डराएंगी,
पर मेरी मिट्टी की खुशबू, हर मुश्किल से टकराएगी।
भीतर जो ये आग दबी है, इसे मशाल बनाना है,
सोए हुए इस जग को फिर से, नया सवेरा दिखाना है।
डगर कठिन है, राह पुरानी, पर मेरा जज्बा नया है,
इतिहास वही लिखते हैं जग में, जिनका थोड़ा खिसक गया है।
तो आने दो हर तूफ़ान को, चाहे कैसी भी चाल है,
जीत की गूँज सुनाएगा, ये मेरे भीतर का भूचाल है।
-आशुतोष शर्मा 'गौतम'
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