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‘अ’ से पिता

                
                                                         
                            जब भी ज़रूरत पड़ी व्यंजनों को अपने
                                                                 
                            
अर्थ को दुगुना करने की
तो हाथ फैलाए गए स्वरों के समक्ष और
सबसे आगे पाया गया ‘अ’..
यह जानते हुए भी कि शायद खो बैठेगा वह अपना अस्तित्व उनमें मिलकर
बिना सोचे समझे वह जा मिला
और स्वरों की पंक्ति का सबसे प्रथम दावेदार
सबसे अंत में खड़ा रहा अक्षर बनने पर
वही ‘अ’ जब दुगुनी शक्ति से जुड़ा ‘क्’ और ‘र्’ में
तो ‘का’ और ‘रा’ बनकर निर्माण हुआ मात्र संबंध का।
इसी संबंध पर श्रद्धा रखकर जब एक दिन ज़रूरत पड़ी ‘अ’ को
और फैलाए गए हाथ व्यंजनों के समक्ष पीछे खड़े होने हेतु
तो दुत्कारा गया शालीनता से और
विदा करा गया अगले बार की एक उम्मीद के साथ।
स्वर समझकर ख़ुद को जब थकी-हारी हालत में
करनी चाही खुद की मदद तो
लाख कोशिशों के बाद भी
कराह सी आवाज़ बनकर होना पड़ा शांत ।।
पर अगले दिन जब फ़िर हाथ फैलाए गए व्यंजनों द्वारा
तो फिर इस दुनिया को भला समझकर
अपना अस्तित्व खोना मुनासिब समझा ‘अ’ ने
और ख़ो बैठा,
लेन-देन की इस ही उधेड़बुन में मैने जाना
वह ‘अ’ हमारे पिता होंगे शायद...
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2 घंटे पहले

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