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Kahani: फ़लाना कुमार हाज़िर हों

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फ़लाना कुमार हाज़िर हों  

  • इरा टाक  


शपथ पत्र  

मैं ईश्वर को हाज़िर-नाज़िर जान कर ये शपथ लेती हूँ कि जो भी इस कहानी में है वो बिलकुल सच बयानी है, हाँ कहानी को रोचक बनाने के लिए कहीं थोड़े बहुत अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग आपको नज़र आ सकता है। पात्रों और स्थानों के नाम गोपनीयता बनाये रखने को बदल या छुपा दिए गए हैं। 

हाँ तो शुरू करें...इस कहानी का बीज तकरीबन 40 बरस पहले ही पड़ गया था लेकिन इसका पता मुझे तब चला जब मैं फल तोड़ने गई। तब तक ये कहानी विशाल बरगद बन चुकी थी, और बरगद पर पीली-पीली अमरबेल का जाल भी फैल चुका था जो मेरे पेड़ के नीचे जाते ही मेरे गले में साँप बन कर लिपट गई। 

हुआ ये था कि मेरी माँ को गुज़रे 10 साल और पिता को गुज़रे हुए 2 साल होने के बाद मैंने सोचा कि चलो मेरे पुश्तैनी मकान को मेरे नाम करा लूँ। वैसे तो मैं ही इस घर की इकलौती वारिस थी और करीब 18 वर्षों से इसी घर में रह रही थी फिर भी सोचा कागज़ी काम निपटा लिए जाएं तो अच्छा रहता है। तो साहब, फ़ौरन से पेश्तर मैं हाउसिंग बोर्ड जा कर ये सारी कार्यवाही करने हेतु फॉर्म ले आई, सामने ही मौजूद दूकान से सारे काग़ज़ पत्र तैयार करवाने के लिए पहुँचीं, तो सबसे पहले माँगा गया राशन कार्ड जो मैंने अपनी लापरवाही के चलते कहीं गुमा दिया था या फाड़-फूड दिया था, सब खोज लिया लेकिन राशन कार्ड न मिला। बाकि सभी तरह के प्रमाण पत्र जैसे आधार कार्ड, मृत्यु-जन्म प्रमाण पत्र, वोटर आई डी, जनआधार कार्ड वगैरह-वगैरह। 

फिर बोला गया कि राशन कार्ड न होने पर इलाके के पार्षद से सजरा प्रमाण पत्र लाओ। हमने पता किया अपने इलाके का पार्षद का और समय लेकर वहाँ पहुँच गए, साथ में ज़रूरी काग़ज़ और दो पड़ोसियों के आधार कार्ड की कॉपी भी जो ये साबित करें कि मैं ही अपने माता-पिता की इकलौती वारिस हूँ और मौजूदा मकान में रहती हूँ। 

पार्षद महोदय का घर मेरे घर से मुश्किल से सात-आठ सौ मीटर ही दूर था, सुबह के नौ बजे जब हम पहुँचे वो फुल वॉल्यूम में टीवी चलाए नब्बे के दशक के गाने सुन रहे थे, जिस पर मुझे मन ही मन घोर आपत्ति थी ख़ैर मैंने धीरज धरते हुए उनको अपनी समस्या बताई और सजरा प्रमाण पत्र बनाने को कहा। गहनता से सारे काग़ज़ों की जांच करते हुए उन्होंने कुछ देर सोचा और फिर बोले मैं कल उधर आपका घर देखने आऊँगा, तभी पड़ोसिओं से पूछताछ करूँगा। मेरा तो माथा भन्ना गया मैंने कहा, “सर ये रहे उनके आधार कार्ड और नंबर आप कॉल ही कर लीजिये, आने की जहमत क्यों करते हैं।”  

बात उनको जम गयी, उन्होंने मेरे दोनों पड़ोसियों को एक-एक करके कॉल किया जिनसे वो चुनाव के दौरान हाथ जोड़ कर वोट मांगने गये थे, मेरे बारे में जानकारी ली और तब तसल्ली करके बोले कि कल आ जाना। मैं अगले दिन गयी तो मुझे अपने लैटर पेड से एक काग़ज़ निकाल कर मुझे देते हुए बोले कि इसमें मेटर को टाइप करवा लाओ, फिर मैं मुहर लगा दूंगा। हम ठहरे कलाकार टाइप इंसान ये सब काग़ज़ी काम बहुत बुरे लगते हैं, किसी की ख़ुशामत करना तो और भी अखरता है, लेकिन बेटा जी जब दुनिया में आकर आधार कार्ड बनवाया है, तो बाकी सब काम भी तो करने ही पड़ेंगे। तो फीकी सी हंसी लिए हम वापस उसी हाउसिंग बोर्ड के सामने वाली दूकान पर पहुँच गये, सब टाइप-वाइप करवा कर हमने वापस पार्षद जी को रिपोर्ट किया जिस पर इस बार बिना कोई आपत्ति जताए उन्होंने अपनी मुहर और एक चिड़िया बैठा दी। 

सोचा था बाद में मकान में नाम ट्रांसफर होने के बाद पार्षद जी को मिठाई देकर आऊँगी, लेकिन इसके बाद जितने पहाड़ चढ़ने पड़े, उसकी थकान से ये भाव भी फीका पड़ गया। 
अगले दिन सारे काग़ज़ और उनके साथ लगने वाली करीब 2500/- रुपये की फीस हाउसिंग बोर्ड के दफ़्तर में जमा करवा दी। बताया गया कि 10-12 दिन में एक लैटर आएगा। 

हम ख़ुश हो गये, काम और यात्राएं जारी रहीं, फिर एक महीना बीतने पर भी जब कुछ नहीं आया तो हमने सोचा चलो पता लगा आये, किस्मत की बात ये है कि वो दफ़्तर मेरे घर से बमुश्किल 3-4 मिनट की दूरी पर था। वहाँ मालूम पड़ा कि घर पर किसी के न होने की वजह से पोस्टमेन काग़ज़ लेकर लौट गया था। ख़ैर काग़ज़ निकलवाया गया और वहाँ के सबसे दबंग टाइप दिखने वाले तिलकधारी बाबू ने मुझे पास बुला कर एक फाइल दिखाई। और पूछा कि ये फ़लाना कुमार कौन हैं, इनके भी सारे काग़ज़ लगेंगे क्योंकि इनका नाम भी फाइल में हैं। 

“हैं.... कौन फ़लाना कुमार!” मैंने सारस सी गर्दन निकालते हुए पुरानी फाइल में झाँका जिससे अभी भी सीलन और धूल की महक आ रही थी। 
सबसे पहले मेरी माँ का नाम उन्हीं की हैंडराइटिंग में लिखा हुआ था क्योंकि घर उनके नाम से लिया गया था, उसके नीचे नॉमिनी में मेरे पापा का, फिर मेरा जिसके आगे उम्र साढ़े तीन साल लिखी हुई थी और मेरे ठीक नीचे चेलपार्क की रॉयल ब्लू इंक से जो अब वर्षों बाद फीकी पड़ चुकी थी, “श्रीमान फ़लाना कुमार उम्र एक वर्ष” लिखा हुआ था। 

अबे ये कौन है भाई, मेरे तो पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक कर बड़ा सा खड्डा बन गयी, जिसमें मैं मुंह के बल धप्प से गिरी। किसी तरह मैंने वहाँ से बाहर निकलते हुए कहा, ये तो कोई नहीं है, मेरी आवाज़ मुझे ही शंका से भरी हुई लग रही थी।  

“कोई कैसे नहीं, कोई तो होगा नाम लिखा हुआ इसका, आपका भाई है।”, बड़े बाबू कड़क कर बोले जिससे उनके माथे पर लगे हुए पीले चन्दन पर कुछ दरारें उभर आईं। 

“भाई..? जब से मैं पैदा हुई हूँ मैंने घर में मेरे सिवा किसी बच्चे की किलकारी न सुनी, ये भाई कहाँ से और कैसे हो गया?” 
“हम नहीं जानते इस पर नाम है तो कोई तो होगा, इनका मृत्यु प्रमाण पत्र लाइए, या नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट लाइए। तभी आगे कोई कार्यवाही हो पाएगी।” 

मेरा खून खौल रहा था लेकिन ये तापमान बड़े बाबू के फरमान की वजह से कम मेरे माता-पिता की भावुक मूर्खता (माफ़ कीजिये इसके लिए और क्या शब्द कहा जाए कि पुत्र के पैदा हुए बिना ही पुत्र का उम्मीद में नाम लिखवा दिया क्योंकि पुत्र ही तो असली वारिस होता है) की वजह से ज़्यादा बढ़ गया था। 
मैंने कहा देखिये जो पैदा ही नहीं हुआ, उसका मृत्यु प्रमाण पत्र कैसे लाऊं, आप कोई दूसरा रास्ता बताइए क्योंकि कोई है ही नहीं मेरे सिवा। 
बड़े बाबू ने दूसरे बाबुओं से मंत्रणा की और बोले कि आप एसडीएम से प्रमाण पत्र बनवा कर लाओ। ठीक है! कहते हुए मैं टूटा हुआ दिल और लुटे-पिटे से अरमान लेकर वहाँ से चल दी, मेरा आत्मविश्वास इतना हिल गया था मानो मैंने स्वयं ही फ़लाना कुमार का हक छीनने की कोशिश की हो। 
मेरी मम्मी अक्सर कहा करती थी कि तेरा भाई होगा तो उसका नाम फ़लाना कुमार रखेंगे लेकिन मुझे घर में मेरे सिवा किसी का पैदा होना पसंद नहीं था। तो मैं साफ़ कह देती थी कि मुझे कोई भाई नहीं चाहिए मैं अकेला ही काफ़ी हूँ, मैं आपकी बुढ़ापे में सीवा (सेवा बोला नहीं पाती थी तब) करूँगा।  
मम्मी बताया करती थीं कि मेरे जन्म के बाद उनके दो-तीन बार एबॉर्शन हो गये और कोई पैदा न हो पाया। 

किन्तु न जाने क्यों ये मकान बुक करते समय उन्होंने कौन से सपने बुन रखे थे या उनके गर्भ में उस वक़्त कोई फ़लाना कुमार था जो जन्म लेने से पहले ही स्वर्ग सिधार गया, जिस वजह से उसका मृत्यु प्रमाण पत्र भी न बन पाया, लेकिन उसको हाउसिंग बोर्ड के काग़ज़ों में दर्ज़ कर दिया गया। ख़ैर इन सवालों के जवाब देने वाले तो स्वर्गवासी हो गये थे और मेरे सामने मेरा फिक्शनल भाई जिंदा हो चुका था। जो वजूद में कैसे आया इस बारे में हमको कयास लगाने थे। 
    

मुझे ऐसे लगता कि जैसे फ़लाना कुमार बोल रहा हो “बहुत पात्र लिखती आई हो न अपनी कहानियों में अब मुझसे मुकाबला करो, मैं सभी पात्रों के साथ हुई नाइंसाफ़ी का बदला लेने आया हूँ। 
जैसे-तैसे घर के पीछे बनी तहसील कोर्ट में गयी, ये अच्छा था कि सब मेरे घर के आसपास ही मौजूद था, वरना दूर जाने के नाम से ही मुझे बुखार आ जाता है। वहाँ पूछताछ करके एक वकील ढूँढा गया जिससे मोलभाव करके बात पक्की हुई, जितने और जैसे भी काग़ज़ मौजूद थे उसको सौंप दिए गए, राशन कार्ड अब भी नहीं था। उसकी जगह हम सजरा से ही मुजरा करवा रहे थे, लेकिन राशन न खरीदने के बावज़ूद राशन कार्ड कितना कीमती है वो बात मेरी समझ में आ गयी थी। मैं शब्दों को भावनाओं में पिरोने में ठीक ज़रूर थी, लेकिन अंकों और काग़ज़ों को सँभालने के मामले में बेहद कमज़ोर थी। 
सारे काग़ज़ एक तरफ़ और राशन कार्ड एक तरफ़, दुनिया की सारी दौलत भी उस वक़्त राशन कार्ड नहीं खरीद सकती थी, जिसमें सिर्फ़ मेरे माता-पिता और मेरा नाम लिखा होना चाहिए था क्योंकि कोई फ़लाना कुमार तो कभी पैदा ही नहीं हुआ था और हाउसिंग बोर्ड के काग़ज़ों के अलावा उसका नाम किसी भी सरकारी काग़ज़ में दर्ज़ नहीं था। हालाँकि मेरे मन में तहसील से पुराना राशन कार्ड निकलवाने का भी ख़याल आया था, कार्ड काफ़ी पुराना था लेकिन शायद कोशिश करने पर निकल ही जाता, लेकिन फिलहाल उस बारे में ज़्यादा सोचा नहीं था। 

तो साहब ढाई हज़ार देकर अगले दिन तक प्रमाण पत्र भी बन गया, जिस पर एसडीएम की मुहर और साइन थे। हम जाकर पूरे कॉन्फिडेंस से उसको हाउसिंग बोर्ड में जमा कर आए, लगा कि किला फतह हो गया। हालाँकि मेरी माँ ने कई जगह ये अपनी हैंडराइटिंग में लिखा हुआ था कि मेरे बाद ये मकान मेरी एकमात्र पुत्री का है लेकिन उसको सबूत नहीं माना जा सकता था, फिर भी उसकी भी फोटोस्टेट लगा दी गयी।   

 फिर कई दिन गुज़र गये कोई लैटर नहीं आया तो वापस हाउसिंग बोर्ड पहुँचे। इस बार बड़े बाबू सीधे अपने अफ़सर के पास ले गये। अफ़सर ने फाइल मँगवाई और बोल दिया कि हम ये काग़ज़ नहीं मान सकते हैं ये तो कोई भी बनवा लेगा, जब फ़लाना कुमार का नाम लिखा है तो कहीं तो कोई होगा, हो सकता है विदेश में रहता हो। मैंने बहुत दलील दी कि आपके बाबू ने कहा था तभी 2500 ख़र्च करके बनवाया तहसील से, सारे पेपर्स हैं मेरे पास। लेकिन उनका दिल एकदम पाषाण बन गया था - 
“नहीं मैडम आप कोर्ट से वारिस प्रमाण पत्र बनवा कर लाओ, फिर आगे कुछ होगा। हम ज़िम्मेदारी नहीं लेंगे। बात खत्म!” 
मैं वापस आ गयी, दिल बेहद दुखी था और मैंने सोचा भाड़ में जाओ, अब कौन काटे सिविल कोर्ट के चक्कर। मेरा तो न मन था और न ही हिम्मत। मैंने मामला कुछ दिन के लिए ठन्डे बस्ते में डाल दिया और अपने काम में लग गयी।  

कुछ महीने निकल गये, मैंने एक-दो सरकारी अफ़सर मित्रों से जुगाड़ लगवाई, तब तक हाउसिंग बोर्ड के उस अड़ियल रवैये वाले अफ़सर का ट्रांसफर हो चुका था और उनकी जगह आया दूसरा अफ़सर कम से कम मेरी बात सुनने को राज़ी था।  
मैंने पूरे मन लगा कर अपने सारे ज्ञान को एक एप्लीकेशन में मोती बना कर पिरो दिया। मैंने लिखा कि पुत्र पाने की अभिलाषा मेरे माता-पिता के मन में इतनी प्रबल थी कि शायद उन्होंने अपनी ज़िन्दगी का पहला मकान बुक करते वक़्त भावुकतावश उसका नाम लिख दिया कि आज नहीं तो कल बेटा पैदा हो ही जाएगा। ये भी हो सकता था कि वो उस वक़्त प्रेग्नेंट रहीं हों (ये मैंने लिखा नहीं, सिर्फ़ सोचा), क्योंकि वो अक्सर बोला करती थीं कि मेरे बाद उनके 2-3 एबॉर्शन हुए, बच्चे टिके नहीं। 
 लेकिन मुझे मालूम है कि इस बात पर कोई भी विश्वास नहीं करेगा तो मैंने अपने चारों सगे चाचाओं का नाम लिखते हुए, लिखा कि वो इस बात का शपथ पत्र देंगे कि मैं अपने माता-पिता की इकलौती संतान और वारिस हूँ। साथ में ये भी लिखा था कि वे सभी सरकारी सेवा से रिटायर्ड हुए है। 
ठीक है मामला सुलझ गया और उन्होंने बोला कि कल आकर लैटर ले जाओ, चाचाओं के शपथ पत्र लाओ और अख़बार में संविदा यानि एक सूचना जिसका फॉर्मेट उन्होंने लिखा था, वो दो अख़बारों में छपवा लो। अगले दिन लैटर ले आई लगा कि चलो देर आये दुरुस्त आये। 
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एक दिन पहले

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