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दीवार में एक खिड़की रहती थी जो आज बंद हो गई, विनोद कुमार शुक्ल होने न होने के द्वैत से परे हो गए

साहित्य
                
                                                         
                            दीवार में एक खिड़की रहती थी जो आज बंद हो गई। होने में क्या होता है और न होने में क्या नहीं होता है, बताने वाले विनोद कुमार शुक्ल होने न होने के द्वैत से परे हो गए। उनका जीवन उनकी किसी कविता की पंक्ति की तरह पूर्ण हुआ। लंबा और सारगर्भित। मद्धम सी आवाज में वो लगातार खामोशी से बोलते रहे। न विनय, न प्रार्थना, न घोषणा और न ही आलोचना, न जाने कौन सा शिल्प था जो जीवन में कविता की तरह फैला था। इत्र की तरह जो दिखता नहीं था पर महसूस होता था। 
                                                                 
                            

एक सबल सृष्टा होकर भी सबकुछ हो जाने के शिल्प में उन्होंने कभी कुछ नहीं कहा। संवेदना के अकाल में भी वो गरम कोट पहने विचारों की तरह निकल जाते थे और हाथ थामने और साथ चलने को पहचानने की कला को मूर्त करते थे। वो अलग अलग तरह से अलग अलग जगह से घर को देखते थे और हर बार घर लौटते थे कि लौटने के अर्थ को इंद्रधनुष किया जा सके। वो झंडा उठाकर नहीं चले। वो नारे लगाते हुए नहीं दिखे। वो प्रतिरोध की किसी पहचानी हुई लकीर के राही नहीं रहे पर वो जिस रास्ते पर चलते रहे, वो सरल नहीं था। वह रास्ता था सरलता का रास्ता। साधारण से भी साधारण होने की ऐसी प्रतिबद्धता कि असाधारण होना इसी साधारण होने से परिभाषित हो। 

उन्होंने शोर और आवाज़ के बीच मद्धम लेकिन दृढ़ स्वर में प्रेम कहा। बंद हुई दीवारों में खिड़कियों की तरह खुले और भागते दौड़ते समय में ठहर कर चलने और जीवन में अर्थ रचने का सलीका दिया। उनकी कविता में चमत्कार कांधे पर लदा बेताल नहीं था बल्कि किसी बच्ची के कंधों पर बैठी गौरैया थी। विनोद कुमार शुक्ल नदी जैसे लोगों के मिलने नदी किनारे गए हैं। आखरी बार सज संवर के, बिना शोर के, केतली से उठती भाप की तरह उठेंगे और हवा हो जाएंगे। कुछ तैरेंगे, कुछ डूब जाएंगे। बहुत थोड़ा सा गुजरेंगे और बहुत अधिक बचे रह जाएंगे। वो अपने होने में फोटो हो रहे हैं ताकि अपने न होने को फोटो में छोड़ जाएं।

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2 महीने पहले

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