जाते हुए को निहारती हुई आँखों में जाने की तस्वीर उभरती है। जाने की तस्वीर में जाने के अलावा और क्या होता है। होती है प्रतीक्षा की अप्रत्यक्ष उपस्थिति। जो दिखता नहीं वही सबसे ज़्यादा उपस्थित होता है। जैसे सत्ता और ईश्वर। जैसे अनिश्चिता और स्वप्न।
पेड़ से पत्ते गिर रहे हैं और पार्क की बेंच में बैठा मैं देख रहा हूँ 'जाता हुआ दिसंबर'। मैं उधर की तरफ मुँह करके खड़ा हूँ। जिधर इतिहास रहता है। उधर से ही भविष्य आता है। जाता हुआ दिसंबर जिस दरवाज़े से जाएगा। जनवरी की आमद उसी दरवाज़े से होगी। आता हुआ, जाते हुए की विपरीत चलता है।
इतिहास और भविष्य किसी एक बिंदु पर आमने-सामने होते हैं। मुखा-मुखम। आँखों में आँखें डाले खड़े होते हैं और वर्तमान मेरी तरह किसी पार्क की किसी बेंच में बैठा सब देखता रहता है। योजनाएं पार्क में झूला झूल रही होती हैं। वर्जिश कर रही होती है। योग करने की कोशिश कर रही होती हैं। नकली हंसी हंसते हुए अवसाद को विसर्जित करने की जद्दोजहद में मुब्तिला होती हैं। और इन सब से बेख़बर पेड़ से पत्ते गिर रहे होते हैं।
इलाहाबाद में एक किला है। कहते हैं अशोक ने बनवाया था। अकबर ने उसे संवारा। उसके पीछे एक चट्टान नुमा पत्थर है। 'जाते हुए दिसंबर' की आखरी शाम उसी पत्थर पर बैठकर बहुत सालों तक 'जाते हुए दिसंबर' को देखता रहा। सूरज के साथ दिसंबर 'पश्चिम' दिशा में यमुना में अस्त हो जाता है।
जेब में पड़े हुए कागज़ के पूर्जे में कुछ लिखा है। दिसंबर जाते हुए जब आख़री बार निहारेगा मुझे, मैं उससे वही बात कहूंगा जो कागज़ के पुर्जे में लिखी है। मैं जानता हूँ दिसंबर नहीं सुन पाएगा। इससे पहले भी कई बार उसने नहीं सुना। लेकिन इस बार जो बात मैं दिसंबर से कहूँगा, वो दिसंबर से ज्यादा ख़ुद से कह रहा हूँगा। जनवरी से कह देना इस बार उसके साथ जो दिसंबर आ रहा होगा। वो बीते दिसम्बरों से अलग होगा। उससे जाते हुए मुझे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं होगी। उसे जाते हुए मैं देखूँगा और दिसंबर के मुंह से निकलेगा 'वाह, बहुत अच्छे'।
साभार: अनुराग अनंत की फेसबुक वाल से
2 वर्ष पहले
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