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आज का शब्द: प्रशांत और जयशंकर प्रसाद की कविता- अपलक जगती हो एक रात !

आज का शब्द
                
                                                         
                            'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- प्रशांत, जिसका अर्थ है- चंचलतारहित, स्थिर, शांत। प्रस्तुत है जयशंकर प्रसाद की कविता- अपलक जगती हो एक रात !
                                                                 
                            

अपलक जगती हो एक रात!
      सब सोये हों इस भूतल में,
      अपनी निरीहता संबल में,
             चलती हों कोई भी न बात!
      पथ सोये हों हरयाली में,
      हों सुमन सो रहे डाली में,
             हों अलस उनींदी नखत पाँत!
      नीरव प्रशांत का मौन बना ,
      चुपके किसलय से बिछल छना;
             थकता हों पंथी मलय- वात.
      वक्षस्थल में जो छुपे हुए-
      सोते हों हृदय अभाव लिए-
             उनके स्वप्नों का हों न प्रात। 

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8 घंटे पहले

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