चांद के साथ कई दर्द पुराने निकले
कितने ग़म थे जो तेरे ग़म के बहाने निकले
फ़सल-ए-गुल आई फिर एक बार असीनाने-वफ़ा
अपने ही खून के दरिया में नहाने निकले
दिल ने एक ईंट से तामीर किया हसीं ताजमहल
तू ने एक बात कही लाख फसाने निकले
दश्त-ए-तन्हाई ये हिजरा में खड़ा सोचता हूं
हाय! क्या लोग मेरा साथ निभाने निकले
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