आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

Urdu Poetry: कतरा के ज़िंदगी से गुज़र जाऊँ क्या करूँ

उर्दू अदब
                
                                                         
                            कतरा के ज़िंदगी से गुज़र जाऊँ क्या करूँ
                                                                 
                            
रुस्वाइयों के ख़ौफ़ से मर जाऊँ क्या करूँ

मैं क्या करूँ कि तेरी अना को सुकूँ मिले
गिर जाऊँ टूट जाऊँ बिखर जाऊँ क्या करूँ

फिर आ के लग रहे हैं परों पर हवा के तीर
परवाज़ अपनी रोक लूँ डर जाऊँ क्या करूँ

जंगल में बे-अमान सी बैठी हुई हूँ मैं
आवाज़ किस को दूँ मैं किधर जाऊँ क्या करूँ

क्या हुक्म आप का है मिरे वास्ते हुज़ूर
जारी सफ़र रखूँ कि ठहर जाऊँ क्या करूँ

कब तक सुनूँ बहार में ख़ुशबू की दस्तकें
क्यों ऐ ग़म-ए-हयात सँवर जाऊँ क्या करूँ

~ नुसरत मेहदी

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें। 

एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर