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अमर उजाला शब्द सम्मान 2025: ममता कालिया और अरमबम ओंगबी मेमचौबी को 'आकाशदीप', इन्हें मिलेगा श्रेष्ठ कृति सम्मान
अरमबम ओंगची मेमचौबी, प्रख्यात साहित्यकार
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
सर्वोच्च सम्मान- आकाशदीप - मणिपुरी (धारा के विरुद्ध)
आकाशदीप से सम्मानित विराट साहित्यकारों की परंपरा में स्वयं को खड़ा देखना मेरे लिए किसी स्वप्न से कम नहीं है। हिंदी के विशाल लोक में मणिपुरी की एक महिला आवाज को सम्मिलित करके अमर उजाला ने सम्मान को मेरे लिए एक ऐतिहासिक स्मृति में बदल दिया है। यह महिला आवाज का सम्मान है।
मेरे लेखन की जड़ें महिलाओं के जीवन और संघर्ष से गहराई से जुड़ी रही हैं। मैं वही लिखती हूं, जो भीतर से मुझे पुकारता है, जो मन के किसी कोने में आकार ले लेता है। मेरे लेखन में यात्राओं के वृत्तांत भी हैं, पौराणिक कथाओं और शमनवाद से जुड़ी रचनाएं भी, जीवनियां हैं, कथा-साहित्य है और नाटक भी। इसलिए किसी एक विषय को चुनकर उसे अपना प्रिय कहना या भविष्य के लिए किसी ठोस लक्ष्य की घोषणा करना मेरे स्वभाव के अनुकूल नहीं है।
मैंने कभी यह सोचकर लिखना शुरू नहीं किया था कि मुझे एक दिन लेखिका बनना है। सच तो यह है कि लिखना मेरे लिए हमेशा एक सहज, आत्मिक शौक रहा-एक ऐसी आदत, जो बचपन से ही मेरे भीतर चुपचाप पनपती रही। पढ़ना मुझे बेहद प्रिय था, जो भी पुस्तक हाथ लगती, मैं उसे पूरा पढ़ जाती, चाहे वे धार्मिक किताबें हों या भाई-बहनों की पाठ्य-पुस्तकें।
मुझे याद आता है कि शायद दस वर्ष की आयु में मैंने पहली बार कुछ पंक्तियां लिखी थीं। स्कूल के दिनों में मैं अपनी कॉपियों और डायरियों में छोटी-छोटी कविताएं और विचार दर्ज करती रहती थी। वे मेरी सृजन-यात्रा के शुरुआती बीज थे। धीरे-धीरे यह शौक एक उद्देश्य में बदलने लगा। अपने आस-पास मैंने महिलाओं से जुड़ी अनेक समस्याएं देखीं- राजनीतिक अस्थिरता, घरेलू हिंसा, कम उम्र में शादियां और स्त्रियों की नजरअंदाज आवाजें। इन अनुभवों ने मुझे भीतर से झकझोर दिया।
मेरी इच्छा थी कि उन महिलाओं की कहानियां दर्ज करूं, जो अपने समय में सक्रिय और प्रभावशाली रहीं, पर इतिहास की धूल में गुम हो गईं। यह काम आसान नहीं था। मैं दूर-दूर तक यात्रा करती। कभी चौदह किलोमीटर बस से, फिर साइकिल से और कई बार पैदल चलकर उन महिलाओं तक पहुंचती। महिलाओं के लिए, उनके इतिहास और अधिकारों के लिए काम करना मुझे गहरा संतोष देता है, मानो शब्द ही मेरे लिए सेवा का माध्यम बन गए हों। मैंने विपरीत धारा में जाकर लिखना शुरू किया था। जब मैंने लिखना शुरू किया था, उस समय हमारे साहित्य पर तथाकथित आधुनिकतावाद का वर्चस्व था। इस विचारधारा में एक अजनबीपन था- कुछ ऐसा, जो मेरी मिट्टी, अनुभवों और स्मृतियों से अलग था। मैंने अपने विश्वासों और रुचियों के अनुसार लिखना शुरू किया। यही मेरी राह बनी, धीमी, लेकिन अपनी। मैंने अपना रास्ता खुद बनाया और अपनी भाषा, अपने प्रतीक और संवेदना खुद गढ़ी। - अरमबम ओंगची मेमचौबी, प्रख्यात साहित्यकार
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