प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान मैं एक छोटा-सा लड़का था और जापानी द्वीपसमूह में शिकोकू द्वीप पर एक सुदूर, जंगली घाटी में रहता था। उस समय दो किताबों ने मुझे बेहद मुग्ध किया-हकलबरी फिन और वंडरफुल एडवेंचर ऑफ नील्स। इन दो किताबों ने मेरा जीवन पूरी तरह बदल दिया। उस समय पूरी दुनिया दहशत के आगोश में थी। हकलबरी फिन पढ़ने के बाद मुझे लगा कि मैं रात में पहाड़ी जंगल में जाकर पेड़ों के बीच सोने में ज्यादा सुरक्षा की भावना महसूस करूंगा, जो मुझे घर के भीतर नहीं महसूस होती थी। द एडवेंचर ऑफ नील्स का नायक एक छोटा सा बच्चा है, जो पक्षियों की भाषा समझता है और एक साहसिक यात्रा करता है। मैंने इन कहानियों से कई तरह का आनंद प्राप्त किया।
जीवन वास्तव में पूरी तरह से स्वतंत्र लगता है...
सबसे पहले तो यह कि घने जंगलों के बीच अपने पूर्वजों की तरह रहने से जीवन वास्तव में पूरी तरह से स्वतंत्र लगता है। दूसरी बात, मुझे नील्स के प्रति सहानुभूति हुई और मैंने स्वयं को नील्स के रूप में पहचाना, जो एक शरारती बच्चा था और जिसने स्वीडन यात्रा के दौरान जंगली हंस की मदद की थी। वह मासूम तथा आत्मविश्वास और विनम्रता से भरा हुआ था। आखिर में जब वह अपने घर लौटता है, तो अपने माता-पिता से कहता है, मां एवं पिताजी, मैं अब बड़ा हो गया हूं और फिर से मनुष्य बन गया हूं।
दुखों को उपन्यास के रूप में लिखकर ही मैं बचा रहा...
मुझे लगता है कि उस कहानी से मैंने जो आनंद प्राप्त किया, उसका उच्चत्म स्तर उसकी भाषा में निहित है। जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ, मुझे भी जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा-अपने परिवार में, जापानी समाज के साथ रिश्ते में और बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अपने जीवन जीने के तरीके में। अपने इन दुखों को उपन्यास के रूप में लिखकर ही मैं बचा रहा। मेरे लेखन की बुनियादी शैली मेरे व्यक्तिगत मामलों से शुरू हुई और फिर यह समाज, देश और दुनिया से जुड़ी।
- केन्जाबुरो ओए, नोबेलजयी जापानी उपन्यासकार
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19 घंटे पहले
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