कोई डाॅक्टर जब अपने पिता की किसी गंभीर बीमारी का इलाज कर रहा हो तो वह क्या अनुभव करता होगा, क्योंकि उस समय वह सिर्फ चिकित्सक नहीं होता, एक जिम्मेदार पुत्र भी होता है। बीमार आदमी को वह केवल एक रोगी नहीं मान पा रहा होगा, उस रोगी से चिकित्सक की भावनाएं भी जुड़ीं होंगी। रोग निवारण में चिकित्सा पद्धतियों में भावुकता की जगह नहीं होती। हालांकि चिकित्सक भी मनुष्य है और मनुष्य स्वभाव से संवेदनशील होता है।
'नोशन प्रेस' से प्रकाशित अद्यतन पुस्तक 'पा और पा पार्किन्सोनिज्म और मेरे पापा' की खास बात यही है कि इसमें जो चिकित्सक है वह पुत्र की भी भूमिका में है और डाॅक्टर की भी भूमिका में, और अब जब यह किताब आपके बीच जाएगी तो वही व्यक्ति अपने लेखकीय भूमिका में भी। 'पा और पा पार्किन्सोनिज्म और मेरे पापा' के लेखक हैं डाॅ. अपूर्व पौराणिक। अपूर्व जी पेशे से डाॅक्टर (न्यूरोफिजिशियन) हैं और उनके पिता दिवंगत कृष्णवल्लभजी पौराणिक ने अपने जीवन के अंतिम 15 वर्ष पार्किन्सन रोग के साथ गुजारे। ऐसे में पुस्तक के लेखक अपनी दोहरी भूमिका कैसे निभा पाए, यह पुस्तक पढ़ने के बाद आपको पता चलेगा।
लेखक की प्रशंसा सबसे पहले इस बात के लिए की जानी चाहिए कि चिकित्सा विज्ञान (Medical Science)से संबंधित विषय को अपनी मातृभाषा हिंदी में प्रस्तुत करने की हिम्मत की और बखूबी इस कार्य को अंजाम दिया। हिंदी के पाठक इस किताब के जरिए 'पार्किन्सन' जैसे रोग और उसके उपचार व रोकथाम के विषय में आसानी पढ़ के जान सकते हैं। अमूमन ऐसे विषयों की जानकारी मेडिकल साइन्स की मोटी-मोटी किताबों में पायी जाती है, वह भी अंग्रेजी के भारी भरकम शब्दों के साथ। इसलिए बड़ी आबादी तक रोग और उसके रोकथाम के विषय में आम आदमी की समझदारी नहीं बन पाती। हिंदी भाषा में ऐसे प्रयास बहुत कम हुए हैं। अब जब पुस्तक बाजार में उपलब्ध हो चुकी है तो ऐसे और भी प्रयास होने चाहिए। और हिंदी में ही क्यूं, बाकी भारतीय भाषाओं में भी ऐसे वैज्ञानिक तथ्यों को अभिव्यक्त किया जाना चाहिए।
पुस्तक मूलत: पार्किन्सोनिज्म रोग से पीड़ित मरीजों व उनके परिजनों के लिए है, ताकि बीमारों को लेकर उनके ज्ञान व समझदारी में बढ़ोत्तरी हो और वे आत्मनिर्भर हो सकें। लेखक का मानना है कि बीमारी का उपचार दोतरफा या बहुतरफा प्रक्रिया है। जिसमें चिकित्सक के साथ- साथ रोगी व उनके परिजनों की भी जिम्मेदारी होती है। रोगी को अपने रोग के विषय में अधिकतम जानकारी हो तो वे स्वयं के उपचार में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं। पुस्तक में पार्किन्सन रोग की आरंभिक और बाद की समस्याओं का उल्लेख है।
पार्किन्सन रोग के विभिन्न लक्षणों का विस्तृत वर्णन पुस्तक के विभिन्न अध्यायों में किया गया है। प्रथम अध्याय में ही पार्किन्सोनिज्म का संक्षिप्त खाका खींच दिया गया है। पुस्तक के दूसरे अध्याय में पार्किन्सोनिज्म का इतिहास पढ़ते हुए पता चलता है कि 1817 ई में लंदन के फिजिशियन डाॅ जेम्स पार्किन्सन ने इस रोग का पहली बार सटीक वर्णन किया। जबकि लगभग तीन हजार वर्ष पुरानी आयुर्वेदिक संहिताओं में पार्किन्सोनिज्म से मिलती जुलती अवस्था का उल्लेख मिलता है, जिसे 'कम्पवात' नाम से जाना गया। कम्प या कंपन वात या वायु। चूँकि आयुर्वेद में तीन तरह के रोगों का इलाज होता है- कफ, पित्त औत वात। इसलिए कहा जा सकता है 'कम्पवात' असल में 'वात' विकार से ही उत्पन्न होता है।
पुस्तक के खण्ड दो में लेखक दोहरी भूमिका निभाते नज़र आते हैं और अपने पिता के शरीर में उभर रहे पार्किन्सोनिज्म के विस्तृत लक्षणों, सावधानियों और निदान का वर्णन करते हैं। इस खण्ड में जितने अध्याय हैं उसमें चिकित्सक व लेखक डाॅ. अपूर्व पौराणिक के पिता जो कि पार्किन्सोनिज्म से पीड़ित हैं, के वर्णन हैं। किताब बताती है कि- पार्किन्सोनिज्म से पीड़ित होने के पहले उनके पिता की बौद्धिकता आला दर्जे की थी। वे साहित्य, अखबार और समसामयिक विषय पर अच्छी पकड़ रखते थे। 60 साल की उम्र में नौकरी से अवकाशप्राप्त होने के बाद लिखने की प्रवृत्ति जगी और एक के बाद एक 5 पुस्तकें प्रकाशित हुईं। लेकिन पार्किन्सोनिज्म हो जाने के बाद स्थितियां वैसी नहीं रहीं। जैसे-जैसे रोग उन्हें जकड़ता गया वैसे वैसे उनमें धीमापन आता गया। समय के साथ कमजोरी भी आती है। कुछ तो उम्र के कारण और कुछ रोग के कारण। यदि इन्सान सक्रिय बना रहे तो पार्किन्सन रोग के बढ़ने पर थोड़ी रोक लगाई जा सकती है।
पुस्तक आगे पार्किन्सन रोग के कई लक्षणों को वर्णित करती है, जैसे वाणी का उच्चारण-
1- आवाज धीमी व कोमल हो जाती है, वाणी का सौष्ठव जाता रहता है
2- बोलते-बोलते ध्वनि का मन्द हो जाना- विशेषकर वाक्य के अंत में
3-आवाज में एकरसता होना। बोली में सामान्य उतार चढ़ाव नहीं रह जाते।
4- आवाज का गुण बदल जाता है, थर्राई हुई, अनुनासिक कम्पित आदि।
5- बोलने में अटकना, आरंभिक शब्दों में रुकावट।
6- आवाज का अस्पष्ट होना, क्या बोला गया समझ में नहीं आता।
7- तीव्र गति से शब्दों को बोलना, अनावश्यक दुहराव करना।
8- कुछ मरीजों में, किन्हीं अन्य कारणों से, सुनने की क्षमता कम हो जाती है और संवाद में अतिरिक्त बाधा बनती है।
ऐसे कई अन्य लक्षण भी हैं जिन्हें आप किताब पढ़के जान सकते हैं। पुस्तक के खण्ड तीन में औषधीय उपचारों के विषय में बताया गया है। इसके अलावा सावधानियां और व्यायाम चिकित्सा पद्धति के विषय में भी विस्तार से वर्णन किया गया है।
कुल मिलाकर पुस्तक दिलचस्प है और जानकारी से भरपूर। पढ़ते हुए कहीं भी भारीपन नहीं महसूस होता, विषय सामग्री को इतने रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है कि कोई भी पाठक या जरूरतमंद एक बार में पढ़ सकता है । आम बोलचाल की भाषा में लिखी गई यह पुस्तक चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक नई शुरूआत है, उम्मीद है आगे ऐसी परियोजनाओं को पंख लगेंगे और भी ऐसी पुस्तकें पाठकों के बीच उनकी ही भाषा में उपलब्ध होंगी और लोग लाभान्वित होंगे।
पुस्तक: पा और पा पार्किन्सोनिज्म और मेरे पापा
लेखक: डाॅ अपूर्व पौराणिक
प्रकाशन: नोशन प्रेस
मूल्य: 450 रु.
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