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अमीर मीनाई: हुए नामवर बे-निशाँ कैसे कैसे

उर्दू अदब
                
                                                         
                            हुए नामवर बे-निशाँ कैसे कैसे
                                                                 
                            
ज़मीं खा गई आसमाँ कैसे कैसे

तिरी बाँकी चितवन ने चुन चुन के मारे
नुकीले सजीले जवाँ कैसे कैसे

न गुल हैं न ग़ुंचे न बूटे न पत्ते
हुए बाग़ नज़्र-ए-ख़िज़ाँ कैसे कैसे

सितारों की देखो बहार आँख उठा कर
खिलाता है फूल आसमाँ कैसे कैसे

कड़े उन के तेवर जो मक़्तल में देखे
लिए नाज़ ने इम्तिहाँ कैसे कैसे

यहाँ दर्द से हाथ सीने पे रखा
वहाँ उन को गुज़रे गुमाँ कैसे कैसे

वो सूरत न आँखों में अब है न दिल में
मकीं से हैं ख़ाली मकाँ कैसे कैसे

तिरे जाँ-निसारों के तेवर वही हैं
गले पर हैं ख़ंजर रवाँ कैसे कैसे

जहाँ नाम आता है उन का ज़बाँ पर
तो लेती है बोसे ज़बाँ कैसे कैसे

हर इक दिल पे हैं दाग़ नाकामियों के
निशाँ दे गया बे-निशाँ कैसे कैसे

बहार आ के क़ुदरत की गुलशन में देखो
खिलाता है गुल बाग़बाँ कैसे कैसे

उठाए हैं मज्नूँ ने लैला की ख़ातिर
शुतुर-ग़मज़ा-ए-सार-बाँ कैसे कैसे

ख़ुश-इक़बाल क्या सर-ज़मीन-ए-सुख़न है
मिले हैं उसे बाग़बाँ कैसे कैसे

जवानी का सदक़ा ज़रा आँख उठाओ
तड़पते हैं देखो जवाँ कैसे कैसे

शब-ए-वस्ल हल होंगे क्या क्या मुअ'म्मे
अ'याँ होंगे राज़-ए-निहाँ कैसे कैसे

ख़िज़ाँ लूट ही ले गई बाग़ सारा
तड़पते रहे बाग़बाँ कैसे कैसे

बना कर दिखाए मिरे दर्द-ए-दिल ने
तह-ए-आसमाँ आसमाँ कैसे कैसे

'अमीर' अब मदीने को तू भी रवाँ हो
चले जाते हैं कारवाँ कैसे कैसे

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21 घंटे पहले

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