Ram Bahadur Rai’s 80th Birthday: वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय के 80वें जन्मदिन पर प्रकाशित संकलन ‘अस्सी के राय साहब’ का लोकार्पण 25 सितंबर को अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में हुआ। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और वरिष्ठ पत्रकार बनवारी ने पुस्तक का विमोचन किया। प्रभात प्रकाशन से छपी इस पुस्तक के संपादक पत्रकार हेमंत शर्मा हैं।
संपादक मंडल में मनोज मिश्र, संदीप जोशी और संजीव कुमार शामिल हैं। पुस्तक में सौ से अधिक संस्मरण और लेख हैं। इसी मंच पर राय साहब ने गांधी-मार्ग, मोदी-मार्ग और दोनों को जोड़ने वाली कड़ी पंडित दीनदयाल उपाध्याय का उल्लेख करते हुए कहा-
“आज भारत मोदी-मार्ग पर है। गांधी-मार्ग से स्वाधीन संग्राम की यात्रा प्रारम्भ हुई थी। मोदी-मार्ग और गांधी-मार्ग जहां मिलते हैं और जो मिलाता है उन पंडित दीनदयाल उपाध्याय का 110वां जन्मदिवस आज है।” राय साहब की बात जहां समाप्त हुई, विमर्श वहीं से शुरू होता है। प्रश्न यह नहीं कि कथन भावुक था या नहीं; प्रश्न यह है कि मोदी-मार्ग को तथ्यों, शासन-शैली और ऐतिहासिक निरंतरता में कैसे समझा जाए।
गांधी-मार्ग का अर्थ केवल अहिंसा या सत्याग्रह नहीं था। वह स्वराज का मार्ग था। ऐसा स्वराज जिसमें ग्राम इकाई बने, उत्पादन स्थानीय हो, नैतिकता राजनीति से ऊपर रहे और अंतिम व्यक्ति का उत्थान शासन का मापदंड बने। दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद गांधी ने जो प्रयोग किए, वे शासन-व्यवस्था से अधिक जीवन-व्यवस्था के प्रयोग थे। स्वच्छता उनके लिए प्रतीक नहीं, अनुशासन था। 1930 के दशक में ही वे बार-बार कहते थे कि स्वराज तब तक अधूरा है जब तक गंदगी और भेदभाव गांव-गली से नहीं हटते।
गांधी का सुशासन का आग्रह नैतिक था। वे शक्ति के विकेंद्रीकरण, ट्रस्टीशिप और साधन-शुद्धि पर बल देते थे। स्वतंत्रता संग्राम इसलिए केवल ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध नहीं था; वह एक नई सार्वजनिक संस्कृति के निर्माण का प्रयास भी था। रामबहादुर राय का संकेत यही है कि यात्रा गांधी-मार्ग से शुरू हुई, पर यात्रा वहीं समाप्त नहीं हुई। स्वतंत्र भारत को शासन की भाषा में उस आदर्श को उतारना था।
दोनों गुजरात की मिट्टी से: स्वच्छता और सुशासन का साझा आग्रह
तुलना तभी सार्थक होती है जब समानता और अंतर दोनों दिखें। महात्मा गांधी पोरबंदर के थे, नरेंद्र मोदी वडनगर के। दोनों गुजरात की सार्वजनिक संस्कृति से निकले। गुजरात में व्यापार, संगठन और सामाजिक सुधार की लंबी परंपरा रही है। गांधी ने उसी मिट्टी से सत्याग्रह और रचनात्मक कार्यक्रम निकाले; मोदी ने उसी मिट्टी से प्रशासनिक अनुशासन और जन-अभियान निकाला।
स्वच्छता दोनों के एजेंडे का केंद्र रही। गांधी के लिए स्वच्छता आत्म-शुद्धि और सामाजिक मर्यादा थी। मोदी सरकार ने 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत गांधी जयंती पर की। यह संयोग नहीं, दावा था कि स्वतंत्रता के प्रतीक पुरुष की अधूरी प्राथमिकता को शासन की भाषा में पूरा किया जा रहा है। ग्रामीण खुले में शौचमुक्ति के आंकड़े, शहरी कचरा प्रबंधन और व्यवहार-परिवर्तन के अभियान उसी दावे की परीक्षा हैं।
सुशासन का दूसरा सूत्र भी जुड़ता है। गांधी चाहते थे कि सत्ता सेवा बने। मोदी शासन ने इसे डिजिटल सार्वजनिक सेवा, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, जनधन-आधार-मोबाइल त्रिकोण और समयबद्ध योजना-निष्पादन के रूप में पेश किया। गुजरात मॉडल की चर्चा लंबे समय से विकास बनाम विस्थापन के विवाद में उलझी रही, पर तथ्य यह है कि दोनों नेताओं ने राज्य को प्रयोगशाला माना। एक ने नैतिक प्रयोगशाला, दूसरे ने प्रशासनिक प्रयोगशाला।
दीनदयाल उपाध्याय: वह सेतु जो गांधी और मोदी को जोड़ता है
राय साहब का सबसे महत्वपूर्ण वाक्य यही है कि दोनों मार्गों को जो मिलाता है, वह दीनदयाल उपाध्याय हैं। 25 सितंबर 1916 को जन्मे उपाध्याय न तो गांधी युग के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे, न स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री। वे विचार के सेतु थे। एकात्म मानववाद को उन्होंने पश्चिमी व्यक्तिवाद और सामूहिकता दोनों से अलग रास्ता बताया। मनुष्य को वे खंडित इकाई नहीं, शरीर-मन-बुद्धि-आत्मा का समग्र मानते थे। समाज को वे संघर्ष नहीं, पूरकता का क्षेत्र मानते थे। अंत्योदय उनका सबसे व्यावहारिक सूत्र हैपंक्ति के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचे। गांधी का अन्त्योदय भी अंतिम जन की चिंता था। मोदी सरकार की अनेक योजनाओं, उज्ज्वला, जनधन, आयुष्मान, पीएम आवास, मुद्रा को शासन स्वयं अंत्योदय की भाषा में रखता है। यह वैचारिक दावा है कि कल्याण केवल सब्सिडी नहीं, गरिमा है।
उपाध्याय भारतीय जनसंघ के संगठक थे। भाजपा उसी धारा की उत्तराधिकारी है। इसलिए मोदी-मार्ग को केवल व्यक्तिगत शैली कहना अधूरा होगा; वह एक विचार-परंपरा का शासन-रूप है। रामबहादुर राय, दीनदयाल उपाध्याय को सेतु कहते हैं तो यह कोई संयोग नहीं है, यहां गांधी और मोदी मार्ग की निरंतरता के बीच सेतु दीनदयाल ही हैं।
मोदी-मार्ग: अंत्योदय से विकसित भारत तक
मोदी-मार्ग को यदि तथ्यों पर कसा जाए तो तीन विशेषताएं उभरती हैं। पहली, बड़ी संख्या में कल्याण योजनाओं का प्रत्यक्ष लाभार्थी तक पहुंचना। दूसरी, बुनियादी ढांचे सड़क, रेल, डिजिटल नेटवर्क, ऊर्जा में विस्तार। तीसरी, सांस्कृतिक आत्मविश्वास की राजनीति, जिसमें राम मंदिर से लेकर वैश्विक मंचों पर भारत की छवि तक शामिल है।
तुलनात्मक दृष्टि से गांधी-मार्ग साधन-शुद्धि और विकेंद्रित स्वराज पर अधिक बल देता था; मोदी-मार्ग केंद्रीय क्षमता, प्रौद्योगिकी और तीव्र निष्पादन पर अधिक बल देता है। दोनों में तनाव भी है। गांधी औद्योगिक केंद्रीकरण से सतर्क थे; वर्तमान भारत विनिर्माण, निर्यात और बड़े निवेश की भाषा बोलता है। गांधी सत्ता के न्यूनतम प्रयोग की बात करते थे; आधुनिक राज्य कल्याण और सुरक्षा दोनों में विस्तारित है।
फिर भी राय साहब का तर्क यह है कि गंतव्य एक है। स्वाधीन भारत का स्वावलंबी और गरिमापूर्ण समाज। गांधी ने यात्रा शुरू की, दीनदयाल ने उसे भारतीय चित्त की भाषा दी, मोदी शासन उसे नीति और अभियान में बदल रहा है। दीनदयाल के 110वें जन्मदिवस पर यह स्मरण इसलिए प्रासंगिक है कि विचार केवल संग्रहालय की वस्तु नहीं रहें।
रामबहादुर राय राजनीतिक नारे नहीं दे रहे। वे एक ऐतिहासिक रेखा खींच रहे हैं-स्वाधीनता संग्राम से सुशासन तक, स्वच्छता के नैतिक आग्रह से स्वच्छता अभियान तक, अंतिम जन की चिंता से अंत्योदय योजनाओं तक। गुजरात दोनों नेताओं की जन्मभूमि है, पर सेतु उत्तर भारत के उस विचारक का है जिसका जन्म आज से एक सौ दस वर्ष पूर्व हुआ। भारत यदि सचमुच मोदी-मार्ग पर है, तो उस मार्ग की विश्वसनीयता इसी बात से तय होगी कि गांधी का अंतिम व्यक्ति और दीनदयाल का अंत्योदय आंकड़ों में ही नहीं, जीवन में भी दिखाई दे।
एक घंटा पहले
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