दिल जल रहे हैं दोस्तो ग़म के अलाव में
बच्चे भी मुब्तला हैं दिमाग़ी तनाव में
पानी की तरह बहती है दौलत चुनाव में
यक-जेहती का तो नाम नहीं रख-रखाव में
इक आदमी के वास्ते पतलून, शर्ट, कोट
इक आदमी के वास्ते मुमकिन नहीं लँगोट
इक घर में इतनी रोटियाँ खाए नहीं बनें
इक घर का है ये हाल कि सत्तू नहीं सनें
इक घर में इतनी रौशनी आँखें नहीं खुलें
इक घर में घासलेट के दीपक नहीं जलें
कुत्ते किसी के सैर को मोटर पे जाए हैं
क़िस्मत के दर पे बैठ के कुछ दुम हिलाए हैं
ये कौन सोचता है बराबर है आदमी
दौलत है जिस के पास वो बेहतर है आदमी
वो आदमी नहीं जो फटीचर है आदमी
राहें तवील और खुले सर है आदमी
उसिया रहा है वो जो ग़रीबी की ओस में
पकवान पक रहे हैं उसी के पड़ोस में
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