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नज़ीर बनारसी की नज़्म: गले में डाल दो बाँहों का हार होली में 

नज़ीर बनारसी की नज़्म: गले में डाल दो बाँहों का हार होली में
                
                                                         
                            कहीं पड़े न मोहब्बत की मार होली में 
                                                                 
                            
अदा से प्रेम करो दिल से प्यार होली में 
गले में डाल दो बाँहों का हार होली में 
उतारो एक बरस का ख़ुमार होली में 

मिलो गले से गले बार बार होली में 

लगा के आग बढ़ी आगे रात की जोगन 
नए लिबास में आई है सुब्ह की मालन 
नज़र नज़र है कुँवारी अदा अदा कमसिन 
हैं रंग रंग से सब रंग-बार होली में 

मिलो गले से गले बार बार होली में 

हवा हर एक को चल फिर के गुदगुदाती है 
नहीं जो हँसते उन्हें छेड़ कर हंसाती है 
हया गुलों को तो कलियों को शर्म आती है 
बढ़ाओ बढ़ के चमन का वक़ार होली में 

मिलो गले से गले बार बार होली में 

ये किस ने रंग भरा हर कली की प्याली में 
गुलाल रख दिया किस ने गुलों की थाली में 
कहाँ की मस्ती है मालन में और माली में 
यही हैं सारे चमन की पुकार होली में 

मिलो गले से गले बार बार होली में 
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6 वर्ष पहले

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