आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हरिवंशराय बच्चन की कविता- युद्ध की ज्वाला जगी है

कविता
                
                                                         
                            युद्ध की ज्वाला जगी है।
                                                                 
                            

था सकल संसार बैठा
बुद्धि में बारूद भरकर,—
क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, मद की,
प्रेम सुमनावलि निदर कर;
एक चिन्गारी उठी, लो, आग दुनिया में लगी है।
युद्ध की ज्वाला जगी है।

अब जलाना और जलना,
रह गया है काम केवल,
राख जल, थल में, गगन में
युद्ध का परिणाम केवल!
आज युग-युग सभ्यता से काल करता बन्दगी है।
युद्ध की ज्वाला जगी है।

किंतु कुंदन भाग जग का
आग में क्या नष्ट होगा,
क्या न तपकर, शुद्ध होकर
और स्वच्छ-स्पष्ट होगा?
एक इस विश्वास पर बस आस जीवन की टिकी है।
युद्ध की ज्वाला जगी है।

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

18 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर