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नीरज ने कहा था- इच्छा है कि कविता पढ़ते हुए ही प्राण निकलें...

Gopaldas Neeraj
                
                                                         
                            ज्योतिष, अंकशास्त्र और आयुर्वेद का अच्छा ज्ञान रखने वाले गीतकार गोपाल दास नीरज अक्सर बातचीत में कहते थे कि उनकी आखिरी इच्छा यही है कि उनके प्राण भी कविता पढ़ते हुए मंच पर ही निकलें। यही कारण था कि श्रृंगारिक गीतों के अलावा उनकी कविता में जीवन के प्रति नश्वरता का भाव भी देखने को मिलता है।
                                                                
                
                
                 
                                    
                     
                                             
                                                

जब उनमें दार्शनिक भाव शामिल होना शुरू हो गया

1990 के बाद से नीरज के काव्य में एक नई चीज यह देखने को मिली कि उसमें दार्शनिक भाव शामिल होना शुरू  हो गया। वह कहते कि ‘कोई चला तो किसलिए नजर डबडबा गई, श्रृंगार क्यों सहम गया, बहार क्यों लजा गई, न जन्म कुछ, न मृत्यु कुछ, बस इतनी सिर्फ बात है, किसी की आंख खुल गई, किसी को नींद आ गई’।
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जब उनमें दार्शनिक भाव शामिल होना शुरू हो गया

एक वर्ष पहले

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