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होली के विभिन्न रंग, इन कविताओं के संग... 

होली के विभिन्न रंग, इन कविताओं के संग... 
                
                                                         
                            नयनों के डोरे लाल-गुलाल भरे, खेली होली !
                                                                 
                            
जागी रात सेज प्रिय पति सँग रति सनेह-रँग घोली,
दीपित दीप, कंज छवि मंजु-मंजु हँस खोली-
                मली मुख-चुम्बन-रोली ।

~सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

जब खेली होली नंद ललन हँस हँस नंदगाँव बसैयन में।
नर नारी को आनन्द हुए ख़ुशवक्ती छोरी छैयन में।।
कुछ भीड़ हुई उन गलियों में कुछ लोग ठठ्ठ अटैयन में ।
खुशहाली झमकी चार तरफ कुछ घर-घर कुछ चौप्ययन में।।
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में।
गुलशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में।

~नज़ीर अकबराबादी
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6 वर्ष पहले

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