गले मुझ को लगा लो ऐ मिरे दिलदार होली में
बुझे दिल की लगी भी तो ऐ मेरे यार होली में
नहीं ये है गुलाल-ए-सुर्ख़ उड़ता हर जगह प्यारे
ये आशिक़ की है उमड़ी आह-ए-आतिश-बार होली में
गुलाबी गाल पर कुछ रंग मुझ को भी जमाने दो
मनाने दो मुझे भी जान-ए-मन त्यौहार होली में
'रसा' गर जाम-ए-मय ग़ैरों को देते हो तो मुझ को भी
नशीली आँख दिखला कर करो सरशार होली में
- भारतेन्दु हरिश्चंद्र
बार बार होली - लुत्फ़ुन्निसा इम्तियाज़
दिखलाएं किस मज़े से अब के बहार होली
खेले हैं सब जम्अ' हो क्या गुल-एज़ार होली
सारी परी-रुख़ां मिल कैसी मचाएं धूमें
रंग ज़र्द सुर्ख़ ले कर खेलें निगार होली
सोने की थालियों में रख कर अबीर-ओ-अब्रक
भर मुठ्ठियाों में फेंके कर के पुकार होली
शीशों में ज़ाफ़रां का रंग-ए-शबाब भर कर
ऊपर से क़हक़हों के है बार बार होली
- लुत्फ़ुन्निसा इम्तियाज़
दूनी बहार होली में - कल्ब-ए-हुसैन नादिर
कोई परी हो अगर हम-कनार होली में
तो अब की साल हो दूनी बहार होली में
किया है वा'दा तो फिर बज़्म-ए-रक़्स में आना
न कीजियो मुझे तुम शर्मसार होली में
सफ़ेद पैरहन अब तो उतार दे अल्लाह
बसंती कपड़े हों ऐ गुल-एज़ार होली में
हमारे घर में उतारेंगे राह अगर भूले
हैं मस्त डोली के उन के कहार होली में
मुझे जो क़ुमक़ुमा मारा तो कर दिया बिस्मिल
अजीब रंग से खेले शिकार होली में
ये रंग पाश हुए हैं वो आज ऐ 'नादिर'
है फ़र्श-ए-बज़्म-ए-तरब लाला-ज़ार होली में
- कल्ब-ए-हुसैन नादिर
बहारें होली की - नज़ीर अकबराबादी
जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की
ख़ुम, शीशे, जाम, झलकते हों तब देख बहारें होली की
महबूब नशे में छकते हों तब देख बहारें होली की
हो नाच रंगीली परियों का बैठे हों गुल-रू रंग-भरे
कुछ भीगी तानें होली की कुछ नाज़-ओ-अदा के ढंग-भरे
दिल भूले देख बहारों को और कानों में आहंग भरे
कुछ तबले खड़कें रंग-भरे कुछ ऐश के दम मुंह-चंग भरे
कुछ घुंघरू ताल छनकते हों तब देख बहारें होली की
- नज़ीर अकबराबादी
होली की बहारें, हसीनों की क़तारें - साग़र ख़य्यामी
छाई हैं हर इक सम्त जो होली की बहारें
पिचकारियां ताने वो हसीनों की क़तारें
हैं हाथ हिना-रंग तो रंगीन फुवारें
इक दिल से भला आरती किस किस की उतारें
चंदन से बदन आब-ए-गुल-ए-शोख़ से नम हैं
सौ दिल हों अगर पास तो इस बज़्म में कम हैं
मेहराब-ए-दर-ए-मै-कदा हर आबरू-ए-ख़मदार
बल खाने से शोख़ी में बने जाते हैं तलवार
कहता है हर इक दिल कि फ़िदा-ए-लब-ओ-रुख़्सार
सब इश्क़ के सौदाई हैं माशूक़ ख़रीदार
सूरज भी परस्तार है बिंदिया की चमक का
हर ज़ख़्म मज़ा लेता है चेहरे के नमक का
रंगीन फुवारें हैं कि सावन की झड़ी है
बूंदों के नगीनों ने हर इक शक्ल जड़ी है
चिल्लाते हैं आशिक़ कि मुसीबत की घड़ी है
वो शोख़ लिए रंग जो हाथों में खड़ी है
तस्कीन मिलेगी जो गले आन लगेगी
पानी के बुझाए से न ये आग बुझेगी
तस्वीर बनी जाती है इक नाज़-ओ-अदा से
पानी हुई जाती है कोई शर्म-ओ-हया से
रेशम सी लटें रुख़ पे उलझती हैं हवा से
बुड्ढे भी दुआ करते हैं जीने की ख़ुदा से
माशूक़ कोई रंग जो चेहरे पे लगा दे
हम क्या हैं फ़रिश्ते को भी इंसान बना दे
हैं गंदुमी चेहरे तो बदन सब के हरे हैं
रंगीन फुवारों से चमन दिल के भरे हैं
उस दिल को ही दिल कहिए क़दम जिस पे धरे हैं
दिल पांव-तले शोख़ जो पामाल करे हैं
है जश्न-ए-बहारां तो चलो होली मनाएं
इस रंग के सैलाब में सब मिल के नहाएं
नफ़रत के तरफ़-दार नहीं साहिब-ए-इरफ़ां
देते हैं सबक़ प्यार के गीता हो कि क़ुरआं
त्यौहार तो त्यौहार है हिन्दू न मुसलमां
हम रंग उछालें तो पकाएं वो सिवय्यां
रंजीदा पड़ोसी जो उठा दार-ए-जहां से
ख़ुशियों का गुज़र होगा न फिर तेरे मकां से
- साग़र ख़य्यामी
आगे पढ़ें
बार बार होली - लुत्फ़ुन्निसा इम्तियाज़
कमेंट
कमेंट X