'ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में फर लो पानी
कुछ याद उन्हें भी कर लो, जो लौट के फिर ना आएं
आजादी के बाद से अब तक कवि प्रदीप की ये पंक्तियां गीतों का सिरमौर बनी हुई हैं। अपने समय में शब्दों की आकाशगंगा में अपनी चमक बिखेर रहे कवि प्रदीप नाम के सितारे की ये पंक्तियां आज भी नस-नस में देशभक्ति का जज़्बा पैदा करती हैं और सही रास्ते के चयन का मार्ग प्रशस्त करती हैं, मनोबल बढ़ाती हैं।
एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने इस गीत की रचनात्मकता के पीछे की कहानी बताते हुए कहा था- 1962 के भारत-चीन युद्ध में भारत की हार से लोगों का मनोबल गिर गया था, ऐसे में सरकार की तरफ़ से फ़िल्म जगत के लोगों से ये अपील की गई कि- भई अब आप लोग ही कुछ करिए। कुछ ऐसी रचना करिए कि पूरे देश में एक बार फिर से जोश आ जाए और चीन से मिली हार के ग़म पर मरहम लगाया जा सके।
इंसान का इंसान से हो भाईचारा
देश, आज़ादी मिलने के बाद खुली हवा में अभी ठीक से सांस भी नहीं ले पाया था कि उसे युद्धोपरान्त हार का दंश झेलना पड़ा। इन्हीं हताश और निराश परिस्थितियों में कवि की कलम से ऐ मेरे वतन के लोगों... गीत फूटा, जिसे स्वर कोकिला लता जी ने अपनी आवाज दी, जिसे सुनकर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की भी आंखें नम हो गईं थीं। कवि प्रदीप ने इस गीत का 'राजस्व' 'युद्ध विधवा कोष' में जमा करने की अपील की। आज भी यह गीत जब बजता है, लोग ठहर जाते हैं, रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
इंसान का इंसान से हो भाईचारा
यही पैगाम हमारा
यही पैगाम हमारा
नये जगत में हुआ पुराना ऊँच-नीच का किस्सा
सबको मिले मेहनत के मुताबिक अपना-अपना हिस्सा
सबके लिए सुख का बराबर हो बँटवारा
यही पैगाम हमारा
यही पैगाम हमारा
हरेक महल से कहो कि झोपड़ियों में दिये जलायें...
1959 में बनी फिल्म 'पैगाम' के इस गीत को कवि प्रदीप ने ही लिखा था और सी रामचंद्र ने संगीत से सजाया, मन्ना डे ने आवाज दी थी। गाने की पंक्तियां सही मायनों में गंगा-जमुनी तहजीब से लोगों का परिचय करवाती हैं। उनके गीतों में सामाजिक न्याय की आवाज मुखर होती है। पुरानी, रूढ़ हो चुकी मान्यताओं के प्रति नकार है, प्रेम, सद्भाव और एकजुटता का संदेश है। आपसी सहयोग और भईचारे का आह्वान है। इसी गीत की अगली पंक्तियां हैं-
हरेक महल से कहो कि झोपड़ियों में दिये जलायें
छोटों और बड़ों में अब कोई फ़र्क नहीं रह जाये
इस धरती पर हो प्यार का घर-घर उजियारा
यही पैगाम हमारा
यही पैगाम हमारा
कवि अपनी रचनात्मकता में उत्पादन के न्यायोचित वितरण की गुहार लगाता है। इसलिए ऐसी आवाजें ही विषम से विषम परिस्थितियों में भी ऊर्जा भरने का काम करती रहती हैं।
आज हिमालय की चोटी से फिर हम ने ललकरा है...
1943 की सुपर-डुपर हिट फिल्म किस्मत के गीत "दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है" ने उन्हें देशभक्ति गीत के रचनाकारों में अमर कर दिया। गीत के अर्थ से क्रोधित तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ्तारी के आदेश भी दिए।
इससे बचने के लिए कवि प्रदीप को भूमिगत होना पड़ा था। प्रदीप अपने गीतों के जरिए सच के पक्ष में तन के खड़े होते हैं, उनकी रचनाओं में एक समतामूलक समाज की अपील है, एक ऐसा समाज जहां किसी भी तरह की जातिगत हिंसा न हो, सांप्रदायिक तनाव न हो, सभी मिलजुलकर रहें और सभी सुखी रहें।
उन्होंने 71 फिल्मों के लिए 1700 गीत लिखे। वतन पर मर मिटने का जज़्बा पैदा करने वाले इस गीतकार को भारत सरकार ने सन् 1997-98 में 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' से सम्मानित किया।
आज हिमालय की चोटी से फिर हम ने ललकरा है
दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है
जहाँ हमारा ताज-महल है और क़ुतब-मीनारा है
जहाँ हमारे मन्दिर-मस्जिद-सिखों का गुरुद्वारा है
इस धरती पर क़दम बढ़ाना अत्याचार तुम्हारा है
दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है
प्रदीप की रचनाएं प्रेरित करती हैं...
ये जज़्बा था उनके गीतों का। य़ानि जब हम गंगा-जमुनी तहजीब पर, भारत की सांस्कृतिक विविधता पर बात करेंगे तब-तब हमें कवि प्रदीप की रचनाओं से प्रेरणा लेनी होगी। 11 दिसम्बर 1998 को 83 वर्ष के उम्र में इस महान कवि का मुम्बई में देहांत हो गया। उनके लिखे कालजयी गीतों और कविताओं का आकर्षण उस जमाने में भी था और आज भी है, और हमेशा बरकरार रहेगा।
6 फरवरी 1915 में मध्य प्रदेश के 'उज्जैन' के 'बड़नगर' में जन्म लेने वाले कवि प्रदीप का असली नाम 'रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी' था। लिखने-पढ़ने का संस्कार उन्हें घर में मिला। जब देश में स्वतंत्रता आंदोलन की लपटें तेज हो रही थीं, रामचंद्र के भीतर भी उमड़-घुमड़ के एक प्रदीप आकार ले रहा था।
चूंकि उस दौर को, अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचारों को, उन्होंने देखा था, इसलिए वो सारी चीजें उनकी रचनाओं में मजबूती से शामिल हैं। अपनी रचनाओं का जब वो पाठ करते थे, लोग उन्हें बड़ी तन्मयता से सुनते थे, क्योंकि उनका कंठ बहुत सुरीला था। उनकी पहचान 1940 में रिलीज हुई फिल्म 'बंधन' से हुई।
देशभक्ति और राष्ट्रवाद को लेकर तमाम तरह के भ्रम और अटकलबाजियों के इस दौर में कवि प्रदीप के लिखे गीत- 'ऐ मेरे वतन के लोगों', 'साबरमती के संत', 'हम लाए हैं तूफान से किश्ती निकाल के', 'आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं', 'इंसान का इंसान से हो भाईचारा' देश प्रेम की सही समझ पैदा करते हैं। इनके गीतों का सार देश और उसकी भक्ति है। उन्होंने सामाजिक एकता पर सबसे अधिक जोर दिया।
आज के इस इंसान को ये क्या हो गया
सन 1963 में फिल्म 'अमर रहे प्यार' रिलीज हुई थी, इस फिल्म के लिए प्रदीप जी ने 'आज के इस इंसान को ये क्या हो गया' गीत लिखा, जो कमोबेश आज की स्थितियों में फिट बैठता है-
आज के इस इंसान को ये क्या हो गया
इसका पुराना प्यार कहाँ पर खो गया
कैसी ये मनहूस घड़ी है
भाईयों में जंग छिड़ी है
कहीं पर खून कहीं पर ज्वाला
जाने क्या है होने वाला
सबका माथा आज झुका है
आजादी का जुलूस रूका है
चारों ओर दगा ही दगा है
हर छूरे पर खून लगा है
आज दुखी है जनता सारी
रोते हैं लाखों नर नारी
रोते हैं आंगन गलियारे
रोते आज मोहल्ले सारे
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