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इब्न-ए-इंशा: दिल ने हमारे बैठे-बैठे कैसे-कैसे रोग लगाए

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दिल ने हमारे बैठे-बैठे कैसे-कैसे रोग लगाए
तुम ने किसी का नाम लिया और आँखों में अपनी आँसू आए

जितनी ज़बानें उतने क़िस्से अपनी उदासी के कारन
लेकिन लोग अभी तक ये सादा सी पहेली बूझ न पाए

'इश्क़ किया है किस से किया है कब से किया है कैसे किया है
लोगों को इक बात मिली अपने को तो लेकिन रोना आए

राह में यूँ ही चलते-चलते उन का दामन थाम लिया था
हम उन से कुछ माँगें चाहे हम से तो ये सोचा भी न जाए

नज्म-ए-सहर के चेहरे से 'इंशा' इतनी भी उम्मीदें न लगाओ
ऐसा भी हम ने देखा है अक्सर रात कटे और सुब्ह न आए

एक दिन पहले

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