मुनीर के अकेलेपन को समझते-समझते आप अकेले हो जाओगे। उनके अकेलेपन के नए अंदाज को समझने का लोगों में धैर्य नहीं था और इस तरह मुनीर को लोग 'अजनबी' समझ बैठे। मैंने मुनीर को जितना पढ़ा है उसके बाद मैं उन्हें 'अजनबी' नहीं बल्कि चाह के बगैर गहरे एहसास में डूबे रहने वाला शायर मानता हूं। मुनीर की शायरी मेरे मन के अंदर के तारों को खोलती है। मुझे उनका अजनबीपन अच्छा लगा।
मुनीर का अकेलापन उनकी नज्मों में साफ देखा जा सकता है। समय की धड़कनों के इस शायर की कुछ गजलें तो दर्शन का गहरा एहसास अपने में समेटे हुए है।
इतने खामोश भी रहा न करो
गम जुदाई में यूं किया न करो
ख्वाब होते हैं देखने के लिए
उनमें जा कर मगर रहा न करो
कुछ न होगा गिला भी करने से
जालिमों से गिला किया न करो
उन से निकलें हिकायतें शायद
हर्फ लिख कर मिटा दिया न करो
अपने रुत्बे का कुछ लिहाज मुनीर
यार सब को बना लिया न करो
प्रसिद्ध शायर शीन काफ निजाम आगे लिखते हैं कि मुनीर हिज्र वियोग और हिज्रत प्रवास की ऐसी संधि रेखा पर खड़े हैं जो रहस्यात्मक ढंग से कभी आदम की जन्नत से तो कभी मुनीर के होशियारपुर से पाकिस्तान की हिज्रत हो जाती है। सूफियों की शब्दावली में विसाल मौत का दूसरा नाम है और हिज्र जीवन या संसारवास का। लेकिन बकौल अहमद नदीम कासमी मुनीर का तसव्वुफ मीर दर्द और असगर गौंडवी से बिल्कुल अलग है। दूसरे शब्दों में यह परंपरागत सूफीवाद से भी भिन्न है। दूसरे शब्दों में यह परंपरागत सूफीवाद से भिन्न है। शायद यही सबब है कि उन्हें किसी भी तरह के वाद या नजरिए से नहीं नापा-परखा जा सकता है।
आदत सी बना ली है तुमने तो मुनीर अपनी
जिस शहर में भी रहना उकताए हुए रहना
शीन काफ निजाम के अनुसार मुनीर की शायरी में बनावट और बुनावट नहीं, सीधे-सीधे अहसास को अल्फाज और जज्बे को जबान देने का अमल है। उनकी शायरी का ग्राफ बाहर से अंदर और अंदर से अंदर की तरफ है। एक ऐसी तलाश जो परेशान भी करती है और प्राप्त होने पर हैरान भी, जो हर सच्चे और अच्छे शायर का मुकद्दर है। इसलिए उनकी तलाश का हासिल यह है-
बरसों से इस मकान में आया नहीं कोई
अंदर है इसके कौन ये समझा नहीं कोई
मुनीर की शायरी और नज्मों की तहकीकात करें तो पता चलता है कि उन्हें तन्हाई-कुंठा और महानगरीय अभिशप्त जीवन के 'अकेलेपन' का शायर समझ लिया गया है। वास्तव में मुनीर की तरह ही मुनीर का अकेलापन भी एक अलग तरह का था। यह अकेलापन अद्वितिय होने की बजाय दूसरों के अकेलेपन को 'सम्मान' और उन्हें अकेलेपन की स्वतंत्रता देने का परिणाम था। अकेलेपन का यह अंदाज नया रहा लिहाजा मुनीर को अजनबी समझा गया।
गम से लिपट ही जाएंगे ऐसे भी हम नहीं
दुनिया से कट ही जाएंगे ऐसे भी हम नहीं
दिन-रात बांटते हैं हमें मुख्तलिफ ख्याल
यूं इन में बंट ही जाएंगे ऐसे भी हम नहीं
इतने सवाल दिल में हैं और वो खमोश दर
उस दर से हट ही जाएंगे ऐसे भी हम नहीं
है सख्ती-ए-सफर से बहुत तंग पर मुनीर
घर को पलट कर जाएंगे ऐसे भी हम नहीं
19 अप्रैल 1928 को ब्रिटिश भारत के होशियारपुर में मुनीर का जन्म हुआ। विभाजन के बाद साहिवाल में बस गए और वहीं से मैट्रिक की परीक्षा पास की। उर्दू में प्रकाशित उनकी प्रमुख कृतियां हैं तेज हवा और ठंडा फूल, पहली बात ही आखिरी थी, जंगल में धनक, दुश्मनों के दरमियान शाम, एक दुआ जो मैं भूल गया था और माहे मुनीर। उनकी इस नज्म से तो उनका 'अजबनी' इश्क साफ झलकता है।
आ गयी याद शाम ढलते ही
बुझ गया दिल चिराग जलते ही
खुल गए शहरे-गम के दरवाजे
इक जरा सी हवा के चलते ही
कौन था तू कि फिर न देखा तुझे
मिट गया ख्वाब आंख मलते ही
खौफ आता है अपने ही घर से
माह शबताब के निकलते ही
तू भी जैसे बदल सा जाता है
अक्से दीवार के बदलते ही
खून सा लग गया है हाथों में
चढ़ गया जहर गुल मसलते ही
साभार-
दास्तां कहते-कहते...
देर कर देता हूं मैं
मुनीर नियाजी
वाणी प्रकाशन
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3 वर्ष पहले
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