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क्या हिसाब दूॅ

                
                                                         
                            तन से घुटती साँसों का मैं क्या हिसाब दूँ,
                                                                 
                            
अपने ही जब तोड़ गए, उस दर्द का क्या जवाब दूँ।
जीते-जी अपनों ने मुझको हर पल मारा है,
उस टूटे हुए विश्वास का मैं क्या हिसाब दूँ।।

माँ-पिता पर दोष लगाऊँ, ऐसा संस्कार नहीं,
चुप रहकर जो सब सहा, उसका कोई पार नहीं।
मन ही मन जो घुटता हूँ, किसको अपना हाल कहूँ,
तिल-तिल जलती आत्मा का मैं क्या हिसाब दूँ।।

बच्चों का घुटता बचपन जब आँखों के आगे हो,
उनके भोले प्रश्नों का उत्तर भी अधूरा हो।
रेत-सी फिसलती जाती जीवन की हर एक घड़ी,
बिखरते हुए परिवार का मैं क्या हिसाब दूँ।।

उम्र के इस पड़ाव पर ताने ही ताने मिलते हैं,
अपने ही बनाए आशियाने बिकते दिखते हैं।
हर मजबूरी का आखिर कब तक स्पष्टीकरण दूँ,
टूटते हुए सपनों का मैं क्या हिसाब दूँ।।

घर से दूर रहने का जो हर पल दर्द सताता है,
त्योहारों पर अपनों का चेहरा बहुत रुलाता है।
बिन घरवालों के हँसने की झूठी कोशिशों का,
आँखों में छिपे आँसुओं का क्या हिसाब दूँ।।

मन की घुटन न कह पाया, किस-किस को समझाऊँ,
दर्द भरी इन आहों को आखिर कहाँ सुनाऊँ।
जीवन भर जो सहता आया, उसका लेखा कौन करे,
बस इतना ही पूछूँ जग से — मैं क्या हिसाब दूँ।।
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एक घंटा पहले

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