उसे अपना जन्मदिन याद नहीं, न अपनी बहनों का।
तारीख़ें शायद किसी प्रमाणपत्र में दर्ज होंगी,
पर घर में उनका कोई उत्सव नहीं था।
लेकिन भाई का जन्मदिन याद है।
माँ कुछ अच्छा बनाती थीं,
पिता के चेहरे पर चमक होती थी, और घर में रौनक उतर आती थी।
तब वे इतने बड़े नहीं थे कि समाज को समझ सकें।
बस इतना जानते थे— बेटा घर की उम्मीद कहलाता है।
वह सबसे बड़ी थी, फिर उसकी बहन, फिर भाई, और सबसे छोटी बहन।
फिर एक दिन भाग्य ने करवट ली।
भाई को दौरे पड़ने लगे।
डॉक्टर बदले, शहर बदले, दवाइयाँ बढ़ती गईं, उम्मीदें घटती गईं।
पच्चीस वर्षों से अधिक बीत गए।
भाई की उम्र बढ़ी, पर जीवन कहीं ठहर गया।
वह कभी यह नहीं कह पाया— "माँ, अब आप आराम करो, मैं हूँ।"
और शायद इस पीड़ा को सबसे अधिक वही समझता होगा।
फिर एक और अँधेरा आया।
वह सोलह साल की थी, बहन चौदह की, और सबसे छोटी मात्र आठ वर्ष की।
पिता अवसाद में चले गए।
घर का एक कमरा दिन में भी अँधेरा रहता था, और पिता घंटों वहीं बैठे रहते।
दो साल।
पूरे दो साल।
कहने को रिश्तेदार थे, अपने लोग थे, पर उन दिनों किसी ने दरवाज़ा खटखटाकर नहीं पूछा—
"बेटी, सब ठीक है?"
वे बच्चियाँ थीं, लेकिन हालात उम्र नहीं देखते।
कभी ट्यूशन, कभी छोटी-मोटी नौकरी, जो मिला, कर लिया।
उसे आज भी याद है, बहन ने एक ड्रेस पसंद की थी।
बहुत देर तक देखती रही, फिर वापस रख दी।
उस दिन माँ की दवा ज़्यादा ज़रूरी थी।
सबसे छोटी बहन ने भी बहुत जल्दी सीख लिया था कि इस घर में इच्छाओं को धीरे बोलना पड़ता है।
एक रात माँ रो रही थीं, पिता चुप थे, और तीनों बहनें जाग रही थीं।
तब पहली बार लगा कि शायद जीवन उनसे जीत जाएगा।
लेकिन अगली सुबह माँ उठीं, आँसू पोंछे, रसोई में गईं, और चूल्हा जला दिया।
उसी दिन उन्होंने जाना कि साहस कैसा दिखता है।
धीरे-धीरे पिता भी लौटे।
पहले जैसे नहीं, लेकिन इतने कि घर फिर घर लगने लगा।
समय बीता।
शादियाँ हुईं।
माँ-पिता ने अपनी सामर्थ्य से कहीं अधिक करके उन्हें विदा किया।
फिर लगा अब शायद सुकून आएगा।
लेकिन जीवन अभी थका नहीं था।
पहले माँ का एक्सीडेंट हुआ।
फिर ऑपरेशन।
तीनों बहनें ऑपरेशन थिएटर के बाहर बैठी थीं, प्रार्थना करती हुई।
जब माँ ने ऑपरेशन के बाद पहली बार उठने की कोशिश की, तो उन्होंने उन्हें सहारा दिया।
और अचानक याद आया—
यही हाथ था जिसने बचपन में उन्हें गिरने से बचाया था।
फिर पिता का भी ऑपरेशन हुआ।
और वे फिर उसी प्रतीक्षा, उसी डर, उसी प्रार्थना के बीच खड़ी थीं।
उनके पति भी हर कदम पर साथ रहे।
कभी यह नहीं कहा— "ये तुम्हारे माता-पिता हैं।"
वे बस परिवार की तरह खड़े रहे।
आज लोग उन्हें एक सफल अधिकारी के रूप में जानते हैं।
लेकिन जब वे पीछे देखती हैं, तो उन्हें अपना पद नहीं दिखाई देता।
उन्हें दिखाई देता है—
माँ का भीगा आँचल, भाई की दवाइयाँ, पिता का अँधेरा कमरा, और बहनों का अधूरा बचपन।
तब समझ आता है कि उनकी हर उपलब्धि में उनकी मेहनत से अधिक माँ की प्रार्थनाएँ, पिता के आशीर्वाद और उन कठिन दिनों की तपस्या शामिल है।
आज भी जब कोई पूछता है—
"बेटा नहीं है क्या?"
तो उन्हें शिकायत नहीं होती।
बस पूरी यात्रा आँखों के सामने आ जाती है।
एक बीमार भाई, एक संघर्षरत पिता, एक अडिग माँ, और तीन बेटियाँ, जिन्होंने अपने हिस्से की न जाने कितनी इच्छाएँ चुपचाप छोड़ दीं।
वे इतिहास में दर्ज नहीं होंगी।
उन्होंने कोई युद्ध नहीं जीता।
उन्होंने बस अपने माता-पिता का हाथ नहीं छोड़ा।
उन दिनों भी नहीं जब घर में अँधेरा था।
आज भी नहीं।
और शायद, यदि आज माँ निश्चिंत होकर सो पाती हैं, यदि पिता राहत की साँस ले पाते हैं,
तो इसलिए नहीं कि उनके घर बेटा था।
बल्कि इसलिए कि उनके घर
तीन बेटियाँ थीं।
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