बहुत कमजोर था पलड़ा हमारा
कभी सलटा नहीं झगड़ा हमरा।
महारत जिसको हासिल थी किताबी
न वो भी पढ़ सका चहरा हमारा
सिखाते सब रहे दस्तूर हमको
न कोई सुन सका किस्सा हमारा।
किसी सूरत बचे बस नींव घर की
सलामत ही रहे कुनबा हमारा।
किए उम्मीद बैठे हैं अनिल हम
कभी चमकेगा ये तारा हमारा।
-पंडित अनिल
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